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सन्निधि संगोष्ठी में आप सभी का स्वागत एवं अभिनन्दन।

Saturday, 22 March 2014

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट माह : मार्च २०१४



सन्निधि संगोष्ठी अंक : 12
दिनाँक / माह :  22 , मार्च 2014
विषय : विभिन्न विषयों पर आधारित
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नमस्कार मित्रो दिनांक 22 मार्च 2014 को सन्निधि की बारहवीं संगोष्ठी सफलता पूर्वक संपन्न हुई, संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार कथाकार अजय नावरिया जी ने की, मुख्य अतिथि के तौर पर क्षमा शर्मा जी हमारे साथ रही और इसके अतिरिक्त विशिष्ट अतिथि के तौर पर डॉ. सुरेश शर्मा, नरेंद्र भंडारी जी हमारे बीच रहे, और उनके साथ अतुल प्रभाकर जी, लतांत प्रसून जी, कुसुम शाह दी, अनुराधा प्रभाकर, अनीता प्रभाकर, अर्चना प्रभाकर जी और उनके पतिदेव, आदरणीय गंगेश गुंजन जी, नंदन शर्मा जी, राजीव तनेजा जी, उनकी धर्मपत्नी संजू तनेजा जो एक अच्छी सखी भी है और हर संगोष्ठी का हिस्सा होती है, केदार नाथ जी जो हर गोष्ठी में श्रोता तौर पर शिरकत करते आये है, प्यारी सखियाँ सुनीता शन्नो जी, अंजू शर्मा और वंदना गुप्ता, सरिता भाटिया दी, प्यारी सुमन जान्हवी, मेरे जीवन का अभिन्न अंग मेरे पतिदेव नरेन् आर्य, छोटी बहन संगीता शर्मा, बीना हांडा जी, महाखबर अखबार से सुधाकर सिंह, विवेक रॉय, गौरव गुप्ता, भाई राजेंद्र कुंवर फरियादी, सरोज जोशी, डॉ सुरेश शर्मा जी की धर्मपत्नी, सखी नेह सुनीता उनकी माँ, और अन्य कई मित्र इस आयोजन का हिस्सा रहे.......

यह सन्निधि की बारहवीं संगोष्ठी थी, इसीलिए इसमें अभी तक मंच पर आई सभी विधाओं को समाहित किया गया, जिसमे कविता, गीत, ग़ज़ल, हायकु, कहानी, लघुकथा, क्षणिका, मुक्तक, व्यंग और दोहे सभी का समावेश देखने को मिला, मंच पर आने वाले रचनाकारों में भाई सुशील जोशी (गीत), शिखा सिंह (कहानी), सीमा अग्रवाल दी, जो कोरबा से है (गीत), भाई अरुन शर्मा (ग़ज़ल), डॉ आरती स्मित (कविता), राजीव तनेजा (व्यंग), गुंजन गर्ग अग्रवाल (हायकु), भाई नीरज द्विवेदी (क्षनिकाए), पी के शर्मा (व्यंग और मुक्तक), मुन्ना भाई यानी अविनाश वाचस्पति (व्यंग), किशोर कौशल जी (दोहे) और सुमन जान्हवी (लघु कथा) लेकर मंच पर आये !!


संगोष्ठी की शुरुवात जनसता के वरिष्ट पत्रकार और सन्निधि के आधार स्तंभ लतांत प्रसून जी ने अपनी चिर परिचित उर्जावान मुस्कान के साथ की......प्रसून जी की जिन्दादिली और उर्जाशीलता हम सभी के लिए प्रेरणा स्त्रोत है, दो शब्द कहने के पश्चात् प्रसून जी ने सन्निधि संगोष्ठी की रीढ़ की हड्डी और हम सभी के मार्गदर्शक अतुल प्रभाकर जी को स्वागत भाषण के लिए आमंत्रित किया.......

अतुल जी ने अपने वक्तव्य में मंच आसीन सभी सुधिजनो और संगोष्ठी का हिस्सा बने सभी मित्रो का स्वागत करते हुए कहा कि राजधानी दिल्ली में ऐसे भी लेखक समूह हैं जो पिछले तीस सालों से लगातार मासिक संगोष्ठी करते आ रहे हैं। उनके सामने हम लोगों की उपलब्धियां बहुत कम हैं, अपार हर्ष हो रहा है, सन्निधि आज अपनी बारहवीं संगोष्ठी कर रही है ......और इसके बाद उन्होंने संगोष्ठी की शुरुवात करने हेतु किरण आर्य को मंच पर आमंत्रित किया......

संगोष्ठी की संयोजक किरण आर्य ने मंच संचालन के साथ सभी विधाओं में अपने भाव मंच से रखे और सादत हसन मंटो जी की एक लघु कथा भी उन्होंने मंच से सुनाई
और मंच पर हर विधा से रचनाकारों को अपने भाव रखने हेतु आमंत्रित किया.....

इसके पश्चात् विशिष्ट अतिथि नरेंद्र भंडारी जी ने अपने वक्तव्य में कहा मैं कोई साहित्यकार नहीं हूँ एक पत्रकार हूँ और इस आयोजन का हिस्सा बनना मेरे लिए सुखद एहसास रहा बहुत, हम पत्रकार हमेशा कटघरे में खड़े नज़र आते है, लेकिन फिर भी चरवेती सिद्धांत पर अमल करते हुए करते है अपने कर्तव्य का निर्वाह सतत उसी प्रकार आप सभी के ये प्रयास सफल रहे और रंग लाये !
डॉ सुरेश शर्मा जी ने अपने वक्तव्य में कहा आज की गोष्ठी में कुछ भाव और व्यंग बहुत बढ़िया थे, सन्निधि की इस उपलब्धि पर मैं अतुल जी और सन्निधि के सभी सदस्यों को बधाई देता हूँ, उसके पश्चात् उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल और दो कविताएं सुनाई, जिनमे उनकी कविता दुमकटी ने दिल पर एक अलग छाप छोड़ी !

इसके पश्चात् संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत करने वाली क्षमा शर्मा जी जो नंदन की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी है, और अभी भी बहुत सी सामाजिक संस्थाओ के साथ जुडी है, ने अपना वक्तव्य दिया, क्षमा जी ने अपने वक्तव्य में कहा, सभागार में उपस्थित इतने सारे रचनाकारों को एक साथ देखकर मैं स्तब्ध हूँ, मैं साधुवाद देती हूँ किरण आर्य को उन्होंने सभी विधाओं में हाथ आजमाया है, उन्होंने कहा सुशील जोशी ने राधा के गाल से गुलाल लेने की बात कही, तो भाई साहब गोरा करने की क्रीम बनाने वालो ने सुन लिया तो पीछे पढ़ जायेंगे, शिखा सिंह की कहानी स्त्रियों की उस मानसिकता को दर्शाती है, जो सुविधाओं का गलत उपयोग करने की भावना को बखूबी दर्शाती है, स्त्री के व्यक्तित्व में जो नकारत्मक है आज स्त्री उसे लिख रही है, वो सराहनीय है, मैं बधाई देती हूँ आप सभी को आपके प्रयासों और सृजनशीलता के लिए ! उन्होंने कहा मुख्य अतिथि की भूमिका बेटी को विदा करने वाले जैसी होती है, किसी की अधिक तारीफ कर दी तो दुसरो को लगता है हमारी तो बखिया उधेड़ दी और इस पर इतनी मेहरबानी क्यों, तो मैं सभी रचनाकारों को स्नेह आशीष देती हूँ !


उनके वक्तव्य के पश्चात् प्रसून जी अध्यक्ष महोदय को बुलाते हुए कहा आज की गोष्ठी में वट वृक्ष वल्लभ डोभाल जी अगर हमारे बीच नहीं आ पाए तो, तुलसी पौधे के रूप में अजय नावरिया जी का हमारे बीच होना भी एक सुखद एहसास है !

अजय नावरिया जी जो दलित लेखक संघ के अध्यक्ष है, उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा, मैं आप सभी को बधाई देता हूँ एक सफल संगोष्ठी की, फेसबुक ने इतना सरल कर दिया है, हम सभी आज चेहरे से एक दुसरे को पहचानते है, आज यहाँ एक तरफ नए रचनाकार है तो दूसरी तरफ पी के शर्मा जी और अविनाश वाचस्पति जी जैसे मंजे रचनाकार भी है, जो नए है वो नएपन को ओढे है और जो पुराने है वो अनुभव के पिटारे के साथ, अविनाश जी को सामने देखकर एक विचार आया हमें अपनी विधा को पहचानना होगा, और अगर हम देर करते है तो बहुत कुछ पीछे छूट जाता है, पहले मैं कविताएं लिखता था, आज जब उन कविताओं को देखता हूँ तो लगता है कितना बचकाना है वो सब, फिर कहानियां लिखना शुरू किया तो लगा हाँ यहीं है मेरी विधा, हम लिखते है, तो केवल लिखने भर के लिए नहीं उसके साथ समकालीनों को पढना भी आवश्यक है, जरुरी है हम परम्परा और समकालीनों को पढ़े, आपको प्रशिक्षण की जरूरत है समय को बदलना है तो खुद को पहचानना होगा, आप सभी ने कुछ हद तक तो मुझे अभिभूत किया ही, बाकी सतत प्रयास ही आगे बढ़ने की कुंजी है !

 प्रसून जी ने कहा की नावरिया जी का कुछ हद तक अभिभूत होना संगोष्ठी की सफलता का घोतक है, बढ़ते हुए पौधों को काटा नहीं जाता है, हम लकड़हाडे नहीं माली है, वरिष्ठ साहित्यकारों को हमारे बीच बुलाने का ध्येय ही ये है की उनके अनुभवों से नए रचनाकार कुछ सीख पाए !
अंत में नंदन शर्मा जी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया और साथ ही ये भी कहा हर समय ये होता आया है जो नए रचनाकार आते है अगर उन्हें बहुत अधिक क्रिटिसाइज कर दिया जाए तो वो भाग जाते है, निराश हो जाते है, तो हमें उन्हें भगाना नहीं उनकी हौसला अफ़जाई करना है !..............


प्रस्तुतकर्ता : किरण आर्य

Friday, 7 March 2014

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट माह : फरवरी २०१४

सन्निधि संगोष्ठी अंक : 11
दिनाँक / माह : 15 फरवरी, 2014
विषय : हायकु / साहित्यिक पत्रकारिता


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नमस्कार मित्रो 15 फ़रवरी को सन्निधि की ग्यारवीं संगोष्ठी जो साहित्यिक पत्रकारिता पर आधारित रही, इस संगोष्ठी की अध्यक्षता जाने माने साहित्यकार सीतेश आलोक जी ने की, मुख्य अतिथि के तौर पर राहुल देव जी हमारे बीच रहे, जो जनसता और आज तक से संपादक के तौर पर जुड़े रहे है .....उनके अतिरिक्त वक्ता के तौर पर विवेक मिश्रा, स्नेहा ठाकुर, विपिन चौधरी, शिवानंद सहर द्विवेदी, और आशीष कांध्वे जी संगोष्ठी का हिस्सा रहे, इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से मित्र जिनमे केदार नाथ जी, मिथिलेश श्रीवास्तव जी उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अनीता श्रीवास्तव जी, संगीता शर्मा, सुशिल जोशी, कामदेव शर्मा, भाई अविनाश वाचस्पति जी उनके मित्र डॉ सुरेश चन्द्र जी उनकी धर्म पत्नी, श्री गंगेश गुंजन जी सहित बहुत से मित्र गण हमारे साथ शामिल रहे.....
संगोष्ठी की शुरुवात लतांत प्रसून जी ने की, और स्वागत भाषण के लिए अतुल जी को आमंत्रित किया, अतुल जी ने स्वागत भाषण के साथ ही संचालन की बागडोर प्रसून जी को सौप दी, प्रसून जी ने साहित्यिक पत्रकारिता की बात करते हुए सबसे पहले विवेक मिश्रा जी को बुलाया.

विवेक मिश्रा जी ने कहा साहित्यिक पत्रकारिता के विषय में बात करते हुए ये जानना आवश्यक है कि साहित्यिक पत्रकारिता क्या है? साहित्यिक पत्रकारिता की बात करते हुए किताबों की बिक्री या अन्य विषयों पर बात भटक जाती है ! जब हम साहित्य की बात करते है तो हम एक भाषा एक विषय की बात नहीं करते है, एक संस्कृति एक समाज के दायरे में साहित्य को नहीं बांधा जा सकता है, जब हम पत्रकारिता की बात करते है तो चीज़े बड़े और व्यापक स्तर पर लेते है, एक चींटी आकाश को मोडती है और आकाश को लील लेती है, साहित्यिक पत्रकारिता केवल सूचना का सन्दर्भ नहीं है, सवालों विचारों तक ले जाने वाली दुनिया है, समाज की परत दर परत खोलने का काम साहित्य के माध्यम से किया जा सकता है, यह व्यवस्था के विरोध की दुनिया है, जीवन में महिमामंडन की दुनिया है, उपदेश्य है जीवन की उदारता, साहित्य के बिना दुनिया चल तो सकती है, लेकिन कहीं पहुच नहीं सकती है, हिंदी में पत्रकारिता 19०० में सरस्वती संपादन में हमारे सामने आई व्यापक रूप में, और जब उसमे वृन्दालाल जी प्रेमचंद जी का उद्भव हुआ तब साहित्यिक पत्रकारिता मुखरित हुई, और रचनाये अधिक मारक सिद्ध होने लगी, १९४७ आजादी के मोहभंग का समय रहा, और सोच जाति धर्म को छोड़ वामपंथ का आलिंगन करने लगी ! बाज़ार आगमन के समय हंस जैसी पत्रिका का उदभव हुआ जो आज तक स्थाई है, हंस के साल बीत जाने के बाद साहित्यिक पत्रकारिता जो हाशिये पर खड़ी थी वर्गीकरण मांगने लगी आज जरूरत है साहित्यिक पत्रकारिता को परिभाषित करने की उसका वर्गीकरण करने की !
इसके पश्चात् किरण आर्य ने साहित्यिक पत्रकारिता पर अपने अल्प ज्ञान के साथ कुछ बातें कहते हुए स्नेह ठाकुर जी को मंच पर आमंत्रित किया !

स्नेह ठाकुर जी ने अपने वक्तव्य में कहा मैं श्रदेय काका साहब जी को नमन करते हुए सयोजकों को धन्यवाद देना चाहती हूँ, काका साहेब स्मरणीय है काश मुझे उनके सानिध्य के कुछ पल प्राप्त हो पाते, बड़े बड़े विद्वान् मंचासीन है किरण जी से मेरा ज्ञान अल्प से भी अल्पतर है, विवेक जी ने काफी अच्छी व्याख्या की, और हमारे ज्ञान को बढाया, मैं ४५ साल से कनाडा में हूँ, मैं भाषा ज्ञान को समझती हूँ मेरा बेटा नही समझ पायेगा द्विवेदी जी ने जो निर्भीकता दिखाई मैं उसे ही पकड़कर निर्भीकता से बात कर रही हूँ, मेरे लिए गर्व का विषय है, स्नेह ठाकुर ने कोयले में से हीरा निकाला, समस्या मेरे सामने साहित्यिक पत्रिका निकालने की है विदेशों में अपनी भाषा को लेकर अधिक कुछ निकाल सकते है, हम विदेशों में केवल कहने भर को भारतीय है, उससे पहले बंगाली बिहारी या उतराखंडी है, यानी क्षेत्रवाद हावी है, कुछ कहते है, गाढ़ी हिंदी मत लिखिए कुछ कहते है कुछ तो साहित्यिक कीजिये तो समस्याएँ आती है बहुत सी आती है, लेकिन प्रयास रहता है की भारतीय संस्कृति को निखार सकूँ और रूप देती रहूँ !

उसके पश्चात् आशीष कंधवे जी ने अपना वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा मैं नमन करता हूँ प्रसून जी अतुल जी और उनके साथ जुड़े सभी सदस्यों को जो हांक रहे है उस रथ को,जो साहित्य को दिशा दे रहा है नई, आज के सन्दर्भ में कहूँ तो खबरों को सनसनीखेज बनाना और टी आर पी के अनुसार परोसना आज पत्रकारिता है, पहले पत्रकारिता की मूल भावना जन चेतना थी जो आज शून्य हो गई है, जो प्रेरित है बाजारवाद और बहुत सी बहती हवाओं से, साहित्य का संस्कार खत्म हो गया है, उस पीढ़ी को मत रोइए जो बीत गई आज को सोचिये सुधारिए मन आज की सोचता हूँ उसे बुनता गुनता हूँ, साहित्य साहित्यिक उत्थान का परिचायक है, उसे हलके में नहीं लिया जा सकता है, निज भाषा को शुभाकांक्षी होना चाहिए, उसे एक खूटे से बंधकर नहीं रहना चाहिए, जब हम खूटे से बंध जाते है तो गुलाम हो जाते है, और जो गुलाम वो निष्पक्ष नहीं हो सकता है, विमर्शपूर्ण हो पत्रकारिता लेकिन ग्रस्त नहीं होनी चाहिए, समाज को उसके शिवत्व को प्राप्त करने के लिए पत्रकारिता माध्यम होनी चाहिए ! पत्रकार मतलब खालसा यानी सच्चा जो खालसा नहीं हो सकता वो पत्रकार नहीं है, पतन की कोई सीमा नहीं है, लेकिन अधोगामी प्रवृतियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देना ही पत्रकारिता है !
विपिन चौधरी ने अपने वक्तव्य में आकड़ो पर प्रकाश डाला कि आज नामचीन अखबारों को पढने वालो की संख्या में जो अधोगति आई है, उन्होंने कहा हिंदी युग्म वाले हम सभी किसी भी विषय को सकारात्मक तौर पर नहीं देख पाते है और साहित्य के हासिए पर होने की ये एक प्रबल वजह है, और इसके साथ ही विपिन ने अपने वक्तव्य में साहित्यिक पत्रकारिता में एक नए आयाम को जोड़ा !
शिवानंद सहर ने अपने वक्तव्य में कहा बोलने के लिए बहुत कुछ नहीं मेरे पास केवल कुछ बुनियादी ठोस बातें कहूँगा, पत्रकारिता पहले पत्रकारिता है, पत्रकारिता के कई पक्ष होते है, जैसे सुचना का संप्रेक्षण, विचारो का संप्रेक्षण, संवादों का संप्रेक्षण इत्यादि जब साहित्यिक पत्रकारिता की बात आती है, तो रिपोर्टिंग एक मात्र ऐसी विधा है, जहाँ आपसे निष्पक्षता की उम्मीद ज्यादा से ज्यादा की जाती है, सूचनाये आती है उन्ही के आधार पर खबरे बनती है, खबर वहीँ होती है जिसे दबाने की मंशा हो, उसके अतिरिक्त बाकी सब केवल विशुद्ध विज्ञापन है, साहित्य में क्या छिपाने की चाह है? साहित्य को इंसान से बड़ा नहीं मानता हूँ, हिंदी लोकभाषाओ का जोड़ तोड़ कही जा सकती है, हमने तमाम भाषाओ से शब्द लिए विधाएं नहीं ली, कोई भी साहित्य मनुष्य और मानवता से बड़ा नहीं हो सकता है !

राहुल देव जी ने अपने वक्तव्य में कहा हिंदी में औपचारिकता वैसे भी बहुत ज्यादा है, मैं पत्रकारिता में रहा हूँ, तो साहित्यिक पत्रकारिता से सरोकार पड़ता रहा है मेरा, और आज भी है, मैं हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के विषय में नहीं बोल सकता हूँ, हिंदी अखबारों में साहित्य के विषय में क्या छपता है, थोड़ी बहुत आलोचना पढता रहता हूँ, साहित्यिक पत्रकारिता के प्रभाव से हम बच नहीं सकते है, बहुत उर्जवाद है, हिंदी की रचनाशीलता साहित्य अनुराग बना हुआ है, आज हिंदी की व्यापकता में एक सिकुडन आती दिखती है, समाज में साहित्यकार की जगह भी सिकुड़ी है, हमारे पिता जो थे वो सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं थे, लेकिन वो थे तो हम है, उनके योगदान को हम अनदेखा नहीं कर सकते है, या ये नहीं कह सकते उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने अपने संसाधनों के साथ जो दिया वो महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार महावीर जी नहीं होते तो हिंदी का स्तर क्या होता? साहित्य में भी क्षेत्रवाद हावी होता गर महावीर जी नहीं होते, हिंदी पर विदेशी साहित्य प्रवृति का बड़ा प्रभाव रहा है, हमने स्वयं को बाहरी दृष्टिकोण से अधिक मापा समझा है, जो भी मित्र अपने प्रयासों से साहित्यिक पत्रिका निकाल रहे है वो सराहनीय है, रिपोर्टिंग में संवादहीनता जो आ रही है चिंताजनक है, साहित्य के क्षेत्र में बड़े अखबारों में साहित्य का स्तर गिरा है, हिंदी की सरकती जमीन को रोकने का प्रयास नहीं दिख रहा है, जो आज स्थिति है वो हिंदी की हत्या या बलात्कार से विलग नहीं है, बड़े अखबारों में ये लगातार दृष्टिगोचर हो रहा है, ये प्रश्न पूछा जाए मठाधीशों से आपके समय में बड़े अखबारों में हिंदी अखबारों में जो छपता रहा उसका क्या स्तर है? और उसके प्रति आपकी जवाबदेही क्या है? गुटबाजी सब जगह होती है, लेकिन हिंदी साहित्य में जितनी खेमेबाजी दिखती है जितनी टांग खिचाई दिखती है, वो आश्चर्यजनक है, जबकि उसके पास वो जमीन वो खाद है, जिसके माध्यम से हिंदी विश्व स्तरीय बन सकती है, साहित्य में गाली गलौज देखने सुनने को मिलती है, भंगिमाओ में, भयानक रोग है छपास रोग, फूल मालाओं लफ्ज़बाजी के बगैर काम नहीं चलता, एक दुसरे की प्रशसा एक जैसे चेहरे गुटों के बीच तुम भी खुश मैं भी खुश जैसा दर्शन चलता रहता है, हिंदी ने अपना अभिजन नहीं पैदा किया है, आज देश में नायक की जरूरत है, हिंदी में नायकत्व नहीं दीखता है, जो नहीं रहे उन्हें महान नहीं बनाना है, जो जीवित है उनमे से नायक को ढूंढना है !

डॉ सीतेश आलोक जी ने अपने वक्तव्य में कहा साहित्य सामाजिक सरंचना को भी नहीं देख पा रहा है, उन्होंने हिंदी विशुद्ध हिंदी के प्रयोग प्रचार प्रसार पर जोर दिया उन्होंने कहा हिंदी के उत्थान के साथ ही साहित्यिक पत्रकारिता और समाज का उत्थान जुदा हुआ है !

और सबसे अंत में कामदेव शर्मा जी ने शानदार ढंग से धन्यवाद ज्ञापन करते हुए संगोष्ठी के समापन की घोषणा की .


प्रस्तुतकर्ता : किरण आर्या

Wednesday, 22 January 2014

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट अंक 10 (18- जनवरी- 2014 )

सन्निधि संगोष्ठी अंक : 10
दिनाँक / माह : 18 जनवरी, 2014
विषय : हायकु / क्षणिका 


नमस्कार मित्रो 18 जनवरी को सन्निधि की दसवीं गोष्ठी जो "हायकु और क्षणिकाओं" पर आधारित रही सफलता पूर्वक संपन्न हुई गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ गज़लकार हायकुकार साहित्यकार श्री कमलेश भट्ट कमल जी ने की,मुख्य अतिथि के रूप में हायकुकार और नवगीतकार श्री जगदीश व्योम जी हमारे बीच में रहे, साथ में अतिथि कवयित्री के तौर पर डॉ वंदना ग्रोवर दी और अतिथि कवि के तौर पर श्री सीमान्त सोहल जी हमारे बीच रहे ! उनके अलावा अतुल प्रभाकर जी उनकी धर्म पत्नी आराधना जी, उनकी सुपुत्री और दामाद जी के साथ प्यारी सी स्वस्ति, लतांत प्रसून जी, कुसुम शाह दी, नंदन शर्मा जी, पुष्पा जोशी, नेहा नाहता, अर्चना प्रभाकर जी उनके पतिदेव, सुबोध कुमार, बीना हांडा जी, राजीव तनेजा, बलजीत कुमार, कामदेव शर्मा, निरुपमा सिंह, रश्मि नाम्बियार, मृदुला शुक्ला, शोभा मिश्रा, देवेश त्रिपाठी, बबली वशिष्ठ, नीरज द्विवेदी, निवेदिता मिश्रा झा, संजय सिंह, आरती शर्मा, राजेंद्र कुंवर फरियादी, संजय कुमार गिरी, प्रियंवदा सिंह, महाखबर अखबार के संपादक सुधाकर सिंह और रांची से व्यंग लेखक पंकज यादव जी पधारे ! 

आयोजन की शुरुवात लतांत प्रसून जी ने अपनी चिरपरिचत मुस्कान के साथ अतिथियों के लिए दो शब्द कहकर की, प्रसून लतांत ने हाइकू और क्षणिकाओं के उद्भव और उसके विकास की चर्चा करते हुए कहा कि विधाएं अलग-अलग भले हों लेकिन वे महत्त्वपूर्ण इसलिए होती हैं कि उसमें किस हद तक सच्चाइयां पिरोई होती हैं। उन्होंने कहा कि 19वीं सदी में जापान में शुरू हुए हाइकू का भंडार काफी समृद्ध है। अब यह हिंदी में भी उपलब्ध है। हिंदी के वरिष्ठ आलोचक क्षणिका जैसी विधा पर तवज्जो नहीं देते पर इसकी रचना भी खूब हो रही है और विभिन्न लघु पत्रिकाओं ने विशेषांक निकाल कर इस विधा के रचनाकारों को प्रोत्साहित भी किया है।
अतुल कुमार जी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए नए रचनाकारों से अपने वरिष्ठ लेखकों की रचनाओं का पाठ करने की जरूरत पर जोर दिया और सन्निधि संगोष्ठी के मकसद को उजागर करते हुए नए रचनाकारों की भूमिका का उल्लेख किया। 

रचनाकरों की ओर से संगोष्ठी के संचालन में अथाह योगदान के लिए विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के सचिव अतुल कुमार जी और उनकी धर्मपत्नी अनुराधा जी का सम्मान भी किया गया।
उसके पश्चात् अतुल जी ने किरण आर्य को सञ्चालन के लिए निमंत्रित किया ! किरण आर्य ने अपनी मुस्कान के साथ जो उनकी पहचान भी है, गोष्ठी की शुरुवात अपने हायकु गुरु पवन कुमार जैन जी के कुछ हायकु पढ़कर की, और हायकु के प्रचार प्रसार में पवन जी के योगदान को भी इंगित किया, मंच पर कुल 8 रचनाकारों ने अपने हायकु और क्षनिकाएं रखी, जिनके नाम है .....अरुन सिंह रूहेला, सुनीता अग्रवाल, सुशीला शिरोयन जी, संगीता शर्मा, राजीव गोयल, किरण आर्य, अभिषेक कुमार अभी, और शोभा रस्तोगी के अलावा हमारी अतिथि कवयित्री डॉ वंदना ग्रोवर दी ने अपनी कुछ क्षनिकाएं और कविताये सुनाई, जो दिल को छू लेने वाली रही, उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा की मैं सिर्फ मैं हूँ ..हमारे दूसरे अतिथि कवि सीमान्त सोहल जी ने भी अपनी कुछ कविताएं सुनाई, और सभी का मन मोह लिया ! 

उसके पश्चात हमारे मुख्य अतिथि श्री जगदीश व्योम जी ने काका कालेलकर जी को प्रणाम के साथ अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया, उन्होंने कहा आज फेसबुक ऐसा माध्यम है जहाँ सभी एक दुसरे से मुखातिब होते रहते है, और वहां दिखने वाले चेहरों को आपने यहाँ एकत्रित किया ये एक बहुत अच्छा आयोजन रहा, जैसे हायकु एक बंधी हुई विधा है, वैसे ही किरण आर्य ने हायकु जैसे ही समय को भी बाँध दिया, सहित्य में जितनी छोटी विधा होती है वह उतनी ही कठिन होती है, किसी बात को कम शब्दों में कहना कठिन होता है बहुत, जो लोग ये सोचकर लिखते है की छोटी विधा है तो आसान होगी वो लोग गलती करते है, कई बार ये बात उठती है की भारत मे इतने प्रकार के छंद है तो फिर हायकु ही क्यों? आप हर कथ्य को कहे कि दोहे में ही कहा जाए तो ये संभव नहीं है, अगर ये संभव होता तो तुलसीदास जी दोहे और चौपाई को छोड़कर बरवे रामायण नहीं लिखते, सभी विधायें एक दुसरे की पूरक है, जिस विधा में हम अपनी बात सहजता से कह सके वो विधा अच्छी है, इसके पश्चात उन्होंने अपने कुछ हायकु पढ़े जो समसामयिक और प्रेरक रहे ! 

इसके पश्चात् संगोष्ठी के अध्यक्ष श्री कमलेश भट्ट कमल जी ने अपने वक्तव्य में कहा, गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के तत्वाधान से होने वाली इस गोष्ठी में शामिल होने का अवसर देने हेतु मैं किरण आर्य और अतुल प्रभाकर जी का आभारी हूँ क्युकि हम रहते तो गाजिअबाद में है लेकिन दिल्ली हमारे लिए दूर बनी रहती है, और दिल्ली को इन्होने हमारे करीब किया, और ये करीबी जिस विधा की वजह से बढ़ी वो कलेवर में छोटी होने के वाबजूद हायकु बड़ी विधा है, जिस तरह दिल्ली में रहते हुए हम आम आदमी की ताक़त समझ सकते है, वैसे ही हायकु एक बहुत ही महत्वपूर्ण विधा है, क्षणिका का जन्म कहाँ से हुआ इसके विषय में ठीक ठीक कुछ कह पाना संभव नहीं है, यह हमारी प्रयोगवादी नई कविता का ही एक हिस्सा है, जिसमे हम संक्षेप में अपनी बात को कुछ शब्दों में सीमित कर देते है, हायकु मुक्तक कविता की जापानी शैली है, जापान में ये सबसे लोकप्रिय शैली है कविता की, बाशो ने १७ वीं शताब्दी में हायकु को एक पहचान दिलाई, आज दुनिया भर में हायकु लिखे जा रहे है अगर आप हिंदी की ही बात करे तो हिंदी की सभी भाषाओं में आज हायकु लिखे जा रहे है, भारत में पहली बार हायकु की चर्चा रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने की १९१६ में, उन्होंने कहा हायकु दुनिया की सबसे छोटी विधा है, हमने हायकु को छंद के रूप में प्रयोग करना शुरू कर दिया, उसके पश्चात १९५९ में अज्ञेय जी ने अपनी पुस्तक में हायकु की पहली चर्चा की, उसके बाद भी हायकु बहुत लस्तम पस्तम चलता रहा !

जेनयु के प्रो. सत्यभूषण शर्मा जी जो पहले जापानी प्रोफ़ेसर थे, उन्होंने हायकु के विषय में विस्तार से बताया, हायकु का ५-७-५ का शिल्प क्या होता है, तो हायकु के प्रचार प्रसार का सारा श्रेय जेनयु को ही जाता है, किरण आर्य भी जेनयु से जुडी है, तो एक बार फिर हायकु जेनयु में लौट रहा है, १९७० के आसपास उन्होंने एक हायकु क्लब की स्थापना भी की, और एक हायकु पत्रिका की शुरुवात भी की, इस हायकु पत्रिका ने विश्व भर में हायकु को एक पहचान दिलाई, प्रो. सत्यभूषण जी कहते थे हायकु सत्य की साधना है, यहाँ शब्दों का बहुत अपव्यय है अज्ञेय जी कहते थे शब्द उर्जा है, और उसका सार्थक प्रयोग होना चाहिए, गाली में भी शब्द होता है, और कविता में भी, साहित्य के माध्यम से हायकु में हम सबसे सटीक ढंग से घनात्मक उर्जा का प्रयोग कर पाते है, हायकु को हम जब जानना शुरू करते है तो उलझन होती है और समझ लीजिये यहीं से हायकु आपको पकड़ रहा है, व्योम जी हमारे बीच है आज हायकु के क्षेत्र में उनका नाम बहुत प्रचलित नामो में से है शुरू में वो कहा करते थे अरे ये भी कोई विधा है, हायकु में बहुत अधिक व्याख्या नहीं होनी चाहिए हायकु स्वयं अपनी बात कहे, वो स्वत बोलता है, हायकु का एक कविता हो जाना उसे सार्थकता प्रदान करता है, अपने कुछ हायकु सुनाने से पहले उन्होंने कहा की अंत में मैं एक बात कहना चाहूँगा इस गोष्ठी में अधिकतर चेहरों को हमने मुस्कुराते हुए देखा, मित्रो हम देखते है साहित्य की गोष्ठियों में अधिकतर चेहरे उदास लटके हुए होते है, अगर साहित्य हमें थोड़ी देर के लिए जीवंत भी ना कर सके तो उसकी सार्थकता कैसी? मंच पर जितने प्रतिभागी आये उनमे बहुत संभावनाए और आत्मविश्वास दिखा, और इसके पश्चात् उन्होंने अपने कुछ हायकु पढ़कर सुनाये ! 

इसके पश्चात् विजयदान देथा की कहानियों पर आधारित एक नाटक का सुमन कुमार के निर्देशन में मंचन किया गया। सांप की व्यथा कथाओं पर केंद्रित इस नाटक को दर्शकों ने खूब सराहा.

प्रस्तुतकर्ता : किरण आर्या

Thursday, 19 December 2013

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट अंक 09 (१४- दिसम्बर -२०१३)

सन्निधि संगोष्ठी अंक : 09
दिनाँक / माह : 14-दिसमबर-२०१३
विषय : दोहे / मुक्तक

नमस्कार मित्रो कल यानी १४ दिसम्बर को सन्निधि की नौवीं गोष्ठी जो "दोहे और मुक्तक" पर आधारित रही सफलता पूर्वक संपन्न हुई गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार साहित्यकार हिरेन्द्र प्रताप सिंह जी ने की, मुख्य अतिथि के रूप में दोहा सम्राट और गज़लकार नरेश शांडिल्य जी हमारे बीच में रहे, साथ में अतिथि कवयित्री के तौर पर कोरबा से आई सीमा अग्रवाल दी और मुंबई से आई शील निगम जी हमारे बीच रही ! उनके अलावा अतुल प्रभाकर जी उनकी धर्म पत्नी आराधना जी, लतांत प्रसून जी, कुसुम शाह दी, नंदन शर्मा जी, आदरणीय सर्वेश चंदौसी जी अखिल चंद्रा जी, रेखा व्यास, अनिल जोशी उनकी धर्मपत्नी सरोज जोशी, पुष्पा जोशी, शशिकांत (गज़लकार) आशीष कंधवे, हर्ष वर्धन आर्य, बालकिशन शर्मा, सुरेन्द्र सैनी, विजय शर्मा, सीमान्त सोहल, सुबोध कुमार, बीना हांडा जी, अनीता दी, अर्चना दी उनके पतिदेव, अशुमन प्रभाकर और उनकी धर्मपत्नी, राजीव तनेजा, बलजीत कुमार, सुशील जोशी, राजेंद्र कुंवर फरियादी, कामदेव शर्मा, संजय कुमार गिरी, निवेदिता मिश्रा झा, अलका भारतीय, उर्मी धीर, अरुन शर्मा
अनन्त , नीरज द्विवेदी, कौशल उप्रेती, इंदु सिंह, वंदना ग्रोवर, मृदुला शुक्ल, संगीता शर्मा, डॉ रेनू पन्त, कांता कावेरी, केदार नाथ, अविनाश वाचस्पति, राम श्याम हसीन, चेतन नितिन राज खरे, परवीन कुमार, वी के बोस, रेनू रॉय, और कुछ अन्य मित्र भी शामिल हुए !


आयोजन की शुरुवात लतांत प्रसून जी ने अपनी चिरपरिचत मुस्कान के साथ अतिथियों के लिए दो शब्द कहकर की, साथ ही उन्होंने संस्कृत में दोहों और मुक्तक की चर्चा करते हुए कहा कि आज हिंदी में लिखे जा रहे दोहे और मुक्तक नीतिपरक और श्रृंगार प्रधान ना होकर मौजूदा समय की सच्चाई और समाज के सरोकारों को वाणी दे रहे है !उसके बाद अतुल जी ने स्वागत भाषण दिया और सन्निधि संगोष्ठी के मकसद को उजागर करते हुए नए रचनाकारों की भूमिका का उल्लेख किया।

सन्निधि की सबसे कर्मठ सदस्य कुसुम शाह दी का सम्मान एक शाल के साथ मुख्य अतिथि और अध्यक्ष महोदय के द्वारा किया गया फिर हम सभी के अज़ीज़ लतांत प्रसून जी का सम्मान शाल देकर किया गया और उसके पश्चात् मुझे यानी किरण आर्य को अपने स्नेह से नवाजते हुए मेरे सभी आदरणीय जनों ने सम्मान स्वरुप विष्णु प्रभाकर जी की अमूल्य कृति "आवारा मसीहा" सम्मान स्वरुप दी जो मेरे लिए बहुत गर्व की बात रही, अतुल जी ने इस बार भी एक यथार्थ घटना सन्देश रूप में सामने रखी, जो वास्तविक धरातल से जुडी हुई थी, फिर सरिता भाटिया जी के पर्तिदेव को गत समय में दिवंगत हुए सभी महान साहित्यकारों को श्रधांजली देते हुए सभी ने दो मिनट का मौन रखा, उसके पश्चात् अतुल जी ने किरण आर्य को सञ्चालन के लिए निमंत्रित किया !


मंच पर कुल 12 रचनाकारों ने अपने दोहे और मुक्तक रखे, जिनके नाम है .....अनीता प्रभाकर, सुशील जोशी, अरुन अनंत शर्मा, नीरज द्विवेदी, इंदु सिंह, मृदुला शुक्ला, किरण आर्य, डॉ रेनू पन्त, निवेदिता मिश्रा झा, अविनाश वाचस्पति, चेतन नितिनराज खरे, और आदरणीय सर्वेश चंदौसी जी उनके अलावा हमारी अतिथि कवयित्री सीमा अग्रवाल दी ने अपने कुछ दोहे और दो गीत हम सभी के समक्ष रखे उनके गीतों ने समां बाँध दिया सबने उन पलों का भरपूर आनंद लिया और हमारी दूसरी अतिथि कवयित्री शील निगम जी ने अपनी एक कविता और एक ग़ज़ल हम सभी के समक्ष रखी !


उसके पश्चात हमारे मुख्य अतिथि श्री नरेश शांडिल्य जी ने अपना वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा सबसे पहले तो मैं आयोजको को बधाई देता हूँ, जिन्होंने 9 महीने में ही संगोष्ठी का ऐसा स्वरुप खड़ा कर दिया है, जो की दिल्ली में बहुत कम संस्थाए कर पा रही है, इसके लिए जो इसके सूत्रधार है अतुल प्रभाकर जी प्रसून लतांत जी कुसुम शाह जी नंदन शर्मा जी और किरण आर्य जी ने इस आयोजन की रूपरेखा रखी, और हम सभी को इस संगठन से जोड़ा ! आज जितने भी प्रतिभागी थे उनको सुनकर बहुत सुखद अनुभूति हुई और बहुत से प्रतिभागियो ने बहुत उम्दा प्रस्तुति यहाँ की, तो बहुत अच्छा लगा की एक प्रबुद्ध और नए रचनाकारो का एक स्वरूप आ रहा है सामने, इसके लिए मैं आयोजको को धन्यवाद देता हूँ ! उन्होंने सुझाव के तौर पर कहा कि यहाँ बहुत संभावनाए है युवा रचनाकारों में, उनकी इस प्रतिभा को निखारने के लिए एक कार्यशाला रखी जा सकती है, जो इन विधाओं के जानकार है उन्हें इन कार्यशाला में बुलाया जाए जिससे उनके और नए रचनाकारों के बीच एक संवाद स्थापित हो सके, कविता किसी को सिखाई नहीं जा सकती है, लेकिन एक दिशा जरुर दी जा सकती है, नए रचनाकारों की जिज्ञासाएं शांत करने के लिए एक कार्यशाला की विशेष भूमिका हो सकती है, मैं आयोजको से निवेदन करूँगा की गर संभव हो सके तो एक ऐसी कार्यशाला की रूपरेखा तैयार की जाए ! इसके पश्चात उन्होंने अपने कुछ दोहे सुनाये सभी श्रोतागण उनके दोहे सुनकर वाह वाह कर उठे, उनके दोहे आयोजन की आत्मा रहे ! अतुल जी ने उसके पश्चात कहा कि हम सभी के पास ये एक अवसर है कि इन गुनीजनो के सानिध्य में हम सीखे गुने बुने और आगे बढे, और इसके बाद अतुल जी ने नरेश शांडिल्य जी और हरेन्द्र प्रताप जी के व्यक्तित्व को मद्देनज़र रखते हुए दो चार पंक्तियाँ कही !


उसके पश्चात गोष्ठी के अध्यक्ष हरेन्द्र प्रताप जी ने अपना वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा मित्रो आज के इस आयोजन के लिए आयोजको को बधाई देना चाहता हूँ,मैं कहना चाहूँगा कि काका कालेलकर जी की और विष्णु प्रभाकर जी की रूह मुझे यहाँ खीच लाई, जैसा की आप सभी जानते है मुझे विष्णु प्रभाकर जी के करीब रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, मैंने उनकी रचनाओं को बहुत करीब से देखा,मैंने कई मर्तबे उनके नाटक और एकांकी पर अभिनय भी किया, जब कोई किसी लेखक की रचनाओं को जीता है तो कहीं ना कहीं वो लेखक से बहुत करीब से जुड़ जाता है, जहाँ तक प्रसून लतांत जी है उनसे मेरा रिश्ता पुराना है, 1985 में भागलपुर में हम एक अखबार से जुड़े थे, और भाई राजेंद्र सिंह के नेतृत्व में खोजी पत्रकारिता के क्षत्र में अलख जगाने का प्रयास भी किया ! आज की संगोष्ठी का विषय कहीं ना कहीं साहित्य में है, जो आज के समय में कहीं खो सा गया है उसे फिर से जीवंत किया इस आयोजन ने, इस विषय को ढूँढने और फिर से जीवित करने के लिए मैं आप सभी को साधुवाद देता हूँ, ये सभी विधाए समकालीन चिंताओं को उकेरती है, एक सृजक अपनी बात बिभिन्न आकारों में कहने की कोशिश करता है, जो आकार उसे सबसे सुलभ लगता है वह उस ओर बह चलता है !
साहित्य का भक्ति काल दोहों और रीतिकाल मुक्तक पर आधारित रहा, दोहे के बिना कोई महाकाव्य नहीं रचा जा सकता है ये रीढ़ है साहित्य की, दोहा लिखना कहना और गढ़ना सबसे मुश्किल काम है पद्य के क्षत्र में, रसखान ने अपने दोहों में बहुत से प्रयोग किये और उन्हें लेकर ही आने वाले साहित्यकारों ने बड़े बड़े लेख लिखे, दोहे मुक्तक में एक बूँद में सागर नज़र आना चाहिए, इसीलिए दोहा रचना सबसे चुनौती पूर्ण है, और सिर्फ दोहा ही नहीं अन्य भाषाओ में जाए तो जहाँ शेर कहे जाते है, या अन्य भाषाओ में जाए तो मुक्तक लिखे कहे जाते है ये मुक्तक जो अद्भुद है, ठेट हिंदी और लोकगीतों में मुक्तक का खूबसूरत प्रयोग देखने को मिलता है, पूरे विश्व की काव्य संस्कृति विलक्षण है और इस विलक्षणता में दोहे उस मोती की तरह से है जो कितनी प्रक्रियाओ के बाद जाकर तैयार होता है, और एक सुखमय एहसास बुनता है, और आज का जो दौर है तमाम अच्छाइयों के बावजूद मानसिक रूप से सभी तनावग्रस्त है, और इस तनाव में जो एक सापेक्ष चीज़ है वो है हम साहित्य से जुड़े लोग इस तनाव को कहीं ना कहीं कम करने का प्रयास करते है, और जाहिर है कोई भी दोहा मुक्तक या काव्य समाज को सुंदर बनाने के लिए रचा जाता है, मैं खुलकर कह सकता हूँ की इतने सालो में पहली बार मैं इस विषय पर कोई संगोष्ठी होते देख रहा हूँ, इसीलिए भी मैं आयोजको को धन्यवाद देना चाहता हूँ, साथ ही ये कहना चाहता हूँ जितनी भी रचनाये मंच पर आई उनके एक उम्मीद एक सम्भावना है!


प्रस्तुतकर्ता : (किरण आर्य)

Friday, 6 December 2013

सन्निधि संगोष्ठी दिसम्बर माह की गोष्ठी में आप सभी सादर आमंत्रित हैं

नमस्कार मित्रों दिसम्बर माह में होने वाली सन्निधि संगोष्ठी 14 दिसम्बर शनिवार सायं ५ बजे से 7 बजे के बीच होना तय हुआ है, इस बार की संगोष्ठी दोहा और मुक्तक पर आधारित रहेगी, इस संगोष्ठी की अध्यक्षता आकाशवाणी में हिंदी अनुभाग के उपनिवेशक एक कवि और लेखक श्री राजेंद्र उपाध्याय जी करेंगे और मुख्य अतिथि के तौर पर वरिष्ठ गज़लकार और दोहा सम्राट के रूप में जाने वाले नरेश शांडिल्य जी हमारे बीच होंगे, इसके अलावा कोरबा से आ रही सीमा अग्रवाल दी और शील निगम जी अतिथि कवयित्री के तौर पर हमारे बीच रहेंगी !

Sunday, 17 November 2013

विस्तृत रिपोर्ट सन्निधि संगोष्ठी माह नवम्बर २०१३

सन्निधि संगोष्ठी अंक : 08
विषय : कहानी
माह : नवम्बर
दिनाँक : 16- नवम्बर - 2013

नमस्कार मित्रो कल यानी 16 नवम्बर को सन्निधि की आठवीं गोष्ठी जो कहानी पर आधारित रही सफलता पूर्वक संपन्न हुई गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार साहित्यकार प्रेमपाल शर्मा जी ने की, मुख्य अतिथि के रूप में हंस के पूर्व कार्यकारी संपादक और कथाकार संजीव जी विशेष अतिथि के रूप में हंस के कार्यकारी संपादक संगम पाण्डेय जी हमारे बीच रहे, उनके अलावा अतुल प्रभाकर जी उनकी धर्म पत्नी आराधना जी, लतांत प्रसून जी, कुसुम शाह दी, आदरणीय गंगेश गुंजन जी, बीना हांडा जी उनके पतिदेव, अनीता दी उनके पतिदेव, राजीव तनेजा, संजू तनेजा, बलजीत कुमार, सुशील जोशी, राजेंद्र कुंवर फरियादी, कामदेव शर्मा, संजय कुमार गिरी, बबली वशिष्ट, कमला सिंह, अलका भारतीय, ममता जोशी, रिया दी, सुमन शर्मा, राजेश तंवर, शोभा मिश्रा, अनघ शर्मा, अरुण अनंत शर्मा, नीरज द्विवेदी, वंदना गुप्ता, वंदना ग्रोवर, इंदु सिंह, मृदुला शुक्ल, निरुपमा सिंह, शोभा रस्तोगी, हितेश कुमार, सुशील कृष्णेत, अविनाश वाचस्पति, सरिता भाटिया, सरिता गुप्ता, पी के गुंजन, भाई राज रंजन उनकी बहन और जीजा जी, अनुराग त्रिवेदी, और कुछ अन्य मित्र भी शामिल हुए !

आयोजन की शुरुवात लतांत प्रसून जी ने अपनी चिरपरिचत मुस्कान के साथ अतिथियों के लिए दो शब्द कहकर की, उसके बाद अतुल जी ने स्वागत भाषण दिया, और एक लघुकथा सुनाई, जो वास्तविक धरातल से जुडी हुई थी, फिर राजेंद्र जी और बि'जी को श्रधांजली देते हुए सभी ने दो मिनट का मौन रखा, उसके पश्चात् अतुल जी ने किरण आर्य को सञ्चालन के लिए निमंत्रित किया, मंच पर चार कथाकारों और एक अतिथि कथाकार ने अपनी रचनाये रखी जिनके नाम है .....हितेश कुमार, शोभा मिश्रा, ब्रिजेश कुमार, अनघ शर्मा, और अनुराग त्रिवेदी जी !

इसके पश्चात् संगम पाण्डेय जी जो हंस के कार्यकारी संपादक है उन्होंने अपना वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा कि मुझे पहली कहानी जो हितेश कुमार की थी उसने बहुत प्रभावित किया शुरू की 3 कहानियां सरलबोध की कहानियां रही, और अंतिम कहानी जो अनघ शर्मा की थी जटल भाव का बोध करा रही थी, कहानियां जो हम पढ़ रहे है और लिख रहे है, सभ्यता और जीवन के जिस मुकाम पर हम पहुचे है, उससे आगे कुछ कहने का प्रयास हम कर रहे है या नहीं, क्युकि जो वास्तविक है, साहित्य हमें उसी से परिचित कराने का नाम है, हालाँकि हिंदी कहानी का इतिहास जो दिख रहा है उसीके आसपास बुना गया है उसकी के संयोगो को जोड़ना हिंदी कहानी का चलन रहा है ! हंस के पिछले अंक में हमने एक कहानी छपी एलिस मुनरो की जिसे नोबल पुरस्कार मिला है, एलिस जी को आज के युग का चेखव कहा जाता है, उस कहानी का प्लाट है एक लड़की है जो शहर जा रही है ट्रेन से कुछ सामान खरीदने ये उसकी अकेले पहली यात्रा है और इस यात्रा के दौरान उसे कुछ लोग मिलते है, जिनमे एक यात्री एक पादरी है, जो उसे बताता है उसने एक तालाब के पास बतखे देखि, पादरी के द्वारा वो वर्णन सुन लड़की के सोचती है पादरी एक कल्पना शील मनुष्य है, और जीवन की कोमलता से वाकिफ है, फिर कुछ समय बाद पादरी का अनावश्यक स्पर्श वो महसूस करती है, और कहानी आगे बढती है उस लड़की की मन की दुविधा को लेकर, तो पूरी कहानी लड़की जो महसूस करती है उसपर आधारित है, मेरा मानना है कहानी में जो दिख नहीं रहा उसे दिखानें का प्रयास होना चाहिए ना की जो दिख रहा है उसे ....और मैंने अपने इस संशय को राजेन्द्र जी के समक्ष रखा और साथ ही ये भी की ये कहानी पढ़कर आपको कैसा लगा, राजेंद्र जी ने कहा इस कहानी में पादरी और लड़की दोनों ही खुद को छिपा रहे है, ये उस कहानी का मूल थ्रस्ट है, तो बस मेरा इतना ही कहना है की इस विचारधारा को सामने रखकर आज कथाकारों को कहानी लिखनी चाहिए !

संजीव जी ने अपने वक्तव्य में कहा ये दिन परम दुःख के है मेरे लिए, आज अपने दुःख के साथ साहित्य में संभावना के जो क्षितिज खुल रहे है, उनकी तरफ भी इशारा करूँगा मैं, आपको लगे जहाँ कुछ आपतिजनक कह रहा हूँ कृपया टोक दीजियेगा, सबसे पहले दुःख की बात राजेंद्र जी से मेरा रिश्ता बहुत करीबी रहा अपने दुःख को शब्दों से राह देने की मेरी कोशिश असफल रही है, इसके अलावा मेरे ऊपर जो वज्रघात हुआ वो है बि'जी का जाना राजस्थानी साहित्यकार विजयदान देथा बि'जी का निधन एक भारी क्षति, बि'जी मुझे बेटे की तरह मानते थे उनसे बहुत कुछ सीखा मैंने जीवन में, आप सभी नए पुराने मित्रो से मैं विनती करूँगा भाषा के स्तर पर कथ्य के स्तर पर लोककथाओ के स्तर पर गर हमारे बीच कोई वैश्विक स्तर का कथाकार था तो उसमे अग्रणीय नाम बि'जी का आता है, उन्हें जरुर पढ़े उनकी कुछ प्रसिद्ध कहानिया थी चरनदास चोर, दुविधा जिस पर पहेली जैसी फिल्म बनी, बि'जी के वैभव पर एक लेख संकलित करने का प्रयास किया था मैंने जो पूरा नहीं कर पाया था मैं ...संगम जी की बातों का आदर करते हुए मैं उनसे इतेफाक़ नही रख पाता, मेरा अपना मानना है की हिंदी कहानी का वैश्विक स्तर कहीं से भी उन्नीस नहीं है, मैंने राजेंद्र जी से भी कई बार कहा और उन्होंने माना भी, हमारे इतिहास में इतनी समृद्ध कहानियां है जिन्हें सोचा भी नहीं जा सकता है, कहानी कहने के कितने विकल्प हो सकते है, बि'जी ने हमारी मान्यताओं से उठाया ! हमारे जो नए रचनाकार कथाकार शुरुवात कर रहे है तो लिखने से पहले कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जो साहित्यकार फैले हुए है उन्हें जरुर पढ़े, अब आती है आज मंच पर आने वाली कहानियों की बात तो अतुल जी ने एक छोटी कहानी से आज शुरुवात की, आज चार कहानियां पढ़ी गई हितेश की कहानी "झीनी झीनी बारिश" में अंचल का संकट, वहन के लोगो की अस्तित्व की लड़ाई दोनों तरफ से मार खा रहे लोग हितेश की कहानी का ताना बाना दोनों को समेटता है, तो इस कहानी को मैं एक तरह से अपनी भोगी हुई कहानी बता सकता हूँ ! शोभा जी ने अपनी कहानी में एक आत्महत्या का हवाला दिया, लडकी के अन्दर की संभावनाए जो खिलनी चाहिए थी नहीं है, भारतीय समाज में बहूँ के साथ व्यवहार का चित्रण, और अंत में नायिका का आत्महत्या करना फिर फिर एक डर का भाव और फिर लेखिका उसे सुखांत में ले आती है, तो कहानी को सहज भाव से बहने दे पात्रो पर हावी ना होने दें ! इसके बाद ब्रिजेश की कहानी जो रियाज़ा के उत्सर्ग की कहानी है, ब्रिजेश की कहानी पर थोड़ी मेहनत की जरूरत है, फिर भी धन्यवाद उन्हें जो उन्होंने साम्प्रदायिकता के स्तर पर कहानी रची, अनघ की कहानी धन्यवाद की पात्र है, और प्रभावित करती है, आज की कहानियों में सबसे सुगठित कहानी अनघ की रही ! सुनाई जाने वाली कहानी पढ़ी जाने वाली कहानी गाथा बनने वाली कहानी कहानी के उदारीकरण के कुछ प्रकार है, कहानी का समृद्ध संसार हमारे यहाँ विकसित हो रहा है, थोडा सा प्रयास कहानी की समृद्धि को बढ़ाएगा !

संगोष्ठी के अध्यक्ष श्री प्रेमपाल शर्मा जी ने अपने वक्तव्य में कहा दोस्तों दिल्ली की गोष्ठियों में अध्यक्षीय वक्तव्य का समय आते आते आधा हॉल खाली हो जाता है, खैर मुझे अच्छा लगा की नए लेखको की पाठशाला तैयार की जा रही है, अतुल जी प्रसून जी और जो भागीदार है सबको बधाई, जिस कक्ष में गोष्ठी हो रही है राजेंद्र जी के हंस के काफी करीब है, यहाँ थोड़ी सी रिहर्सल होगी, पाण्डेय पड़ोस में है हो सकता है वो जल्द ही हंस में छपे कुछ और रचनाकार सामने आये मृत्यु तो सबके लिए एक नियति है ही और राजेंद्र जी विष्णु प्रभाकर जी और जो नहीं है आज उनकी क्षति तो पूरी हो नहीं सकती, एक रचनाकार के तौर पर आप आगे आयेंगे तो उनके लिए ये एक श्रधांजली होगी ! मैं एक प्रश्न से गुजर रहा था कहानियों के दौरान की हिंदी साहित्य जगत में लेखकों की इतनी कमी नहीं है जितनी पाठकों की है, मैं इसे इसीलिए भी कहना चाह रहा हूँ की गर हम उन कहानियों को पढेंगे तो थोडा सा खुद ही समझ आ जाएगा की हिंदी कहानी में हम कहाँ शामिल हो सकते है, किन पात्रताओ की तरफ हम बढ़ सकते है, किसी बच्चे को बार बार मापा जाए तो उसकी लम्बाई रुक जाती है मेरे तीन दिग्गजों ने कई मर्तवा लम्बाई को नापा मैं संक्षेप में कहूँगा सभी कथाकारों में एक तीखी संवेदनशीलता है, विशेषकर शोभा ने जो कहानी पढ़ी, उनकी कहानी स्त्रियों की दशा पर सोचनीय सवाल उठाती है, लेकिन अंत में उनका रिंकू जी को महान पति परमेश्वर बनाना खलता है थोडा, आज भी अफगानिस्तान की मलाला और हमारे यहाँ स्त्री की दशा में अंतर नहीं है और ये दशा बदलेगी तब जब कम से कम हम अपनी कहानियों में उसे सबल रूप दे पाए, ब्रिजेश ने एक मुस्लिम चरित्र को चुना है, वो सराहनीय है, हकीकत वहीँ है आज भी जो मुजफ्फ़रपुर में होता है और उसके लिए सत्ताधारी जिम्मेदार है ! अनघ की कहानी में धीमरी का चरित्र अच्छा है और उनकी कहानी शिल्प की दृष्टि से भी सफल रही !
अंत में आये अनुराग त्रिवेदी जी और अतुल जी की लघुकथा में उन्होंने अपनी बात बहुत सही ढंग से कही, तो दोस्तों आयोजको के लिए मेरी बधाई उन्होंने जगह बहुत अच्छी चुनी है, लतांत प्रसून जी गाँधी जी के बहुत बड़े दीवाने है इसीलिए राजघाट के पास उन्होंने ये जगह चुनी संगोष्ठी के लिए, गांधीवादी संस्थाओ को जितना बेहतर लतांत प्रसून जी ने लिखा किसी और ने नहीं लिखा है, आपने और अतुल प्रभाकर जी ने मुझे बुलाया मैं हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ !...........किरण आर्य
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Saturday, 19 October 2013

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट : माह (अक्टूबर - २०१३)

सन्निधि संगोष्ठी अंक : 07
विषय : व्यंग रचनाएँ
माह : अक्टूबर
दिनाँक : 19 - अक्टूबर - 2013
 
नमस्कार मित्रो 19 अक्टूबर को सन्निधि की सांतवी संगोष्ठी जो व्यंग रचनाओं पर आधारित रही सफलता पूर्वक संपन्न हुई, इस गोष्ठी में अध्यक्ष के तौर पर व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय जी मुख्य अतिथि के तौर पर दिल्ली नगर निगम के सहायक आयुक्त और साहित्यकार सुरेश यादव जी और फिल्मकार राजीव श्रीवास्तव जी हमारे बीच में रहे, उनके साथ आदरणीय कुसुम शाह दी, अतुल जी प्रसून जी, अतुल जी की धर्मपत्नी अनुराधा जी, अनीता दी, उनके पतिदेव, राजीव तनेजा, संजू तनेजा, कामदेव शर्मा, बबली वशिष्ठ, अजय अज्ञात जी, प्रभु नारायण जी, सुरेन्द्र मोहन जी, चेतन नितिनराज खरे, अभिषेक कुमार झा अभी, मित्र शोभा मिश्रा उनके पतिदेव, संजय कुमार गिरी, मेरी प्यारी सखी सरिता दास उनके पति रविन्द्र के दास जी, तंवर जी, और कुछ अन्य मित्रो ने भी इस आयोजन में शिरकत की.........
आयोजन की शुरुवात लतांत प्रसून जी ने अपनी चिरपरिचत मुस्कान के साथ अतिथियों के लिए दो शब्द कहकर की, उसके बाद अतुल जी ने स्वागत भाषण दिया और किरण आर्य को सञ्चालन के लिए आमंत्रित किया, मंच पर जिन मित्रो की रचनाये आई उनमे ......हमारे मुन्ना भाई अविनाश वाचस्पति जी, सीत मिश्रा, सुशील जोशी, नीरज द्विवेदी, रचना आभा, राजीव तनेजा, शिवानन्द सहर, राजेंद्र कुंवर फरियादी, रेनू रॉय, कौशल उप्रेती और सरिता गुप्ता जी रहे !

इसके पश्चात् फिल्मकार राजीव श्रीवास्तव जी ने अपना वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा मैं एक फिल्म फेस्टेवल करने जा रहा हूँ नव यथार्थवाद न्यू रेअलेस्टिक सिनेमा, जिसका फिल्म जगत पर बड़ा इम्पैक्ट रहा है,सत्यजीत रे ने फिल्म दा बाइसिकल देखि और यथार्थवादी सिनेमा की नीव रखी उन्होंने सोचा इसी तरह की फिल्म बनायेंगे उसके बाद विमल राय ने उससे प्रेरित हो दो बीघा जमीन जैसी लोकप्रिय फिल्म बनाई, और वहीँ से शुरुवात हुई हिंदी सिने जगत में वास्तविक जीवन को सिनेमा से जोड़ने की, जहाँ किरदार आये सड़क से उठकर सामने ! फिल्मांकन में यथार्थवादी बहुत सी संभावनाए है और संभावना है की साहित्य फिल्म जगत से जुड़े !

इसके पश्चात् दिल्ली नगर निगम के सहायक आयुक्त और साहित्यकार सुरेश यादव जी ने अपना वक्तव्य दिया, सुरेश जी ने कहा चाहे व्यंग्य रचना हो कहानी हो या कविता वो एक रचनाकार का शौक नहीं हो सकता है, जब कोई व्यक्ति कहता है की रचना लिखना मेरा शौक है तो मुझे वाकई शॉक लगता है, ये एक साधना का ही परिणाम है, ये अलग बात है की रचना कभी बहुत गहरी तो कभी विकट और विकराल होती है, उनमे व्यक्ति का पूरा जीवन भी लग जाता है लेकिन रचना रचना ही होती है छोटी बड़ी नहीं होती है, सभी ने छोटी रचनाये लिखी होती है, उनकी साधना उन्हें बड़ी रचनाओं तक पहुचाती है, बड़े रचनाकार होना और ख्यातिप्राप्त होना दो अलग बात है, कई बार दोनों बात हो जाती है तो सोने पर सुहागा हो जाता है लेकिन प्राय ऐसा होता है जो बड़े अच्छे रचनाकार होते है वो शांत रहकर ख्यति में बहुत पीछे रह जाते है और जो रचनाकार हलके और थोड़े से उथले होते है वो प्रयासरत अधिक होने के कारण ख्यति में आगे निकल जाते है, लेकिन कालांतर में होता ये है केवल रचना ही बचती है जो ख्यति का कारण बनती है, रचना ही बचती है जो आपके व्यक्तित्व का निर्माण करती है, और रचना ही बचती है जिसे लोग याद करते है ! सभी प्रतिभागियों ने अच्छी रचनाये पढ़ी लेकिन मैं चाहता हूँ आप और गहरे डूबे और जब तक कोई रचना संवेदना के किसी एक बिंदु पर घनीभूत नहीं होती है स्थाई प्रभाव नहीं डालती है, अपने प्रयास को एक अच्छी रचना में तब्दील करना एक साधना है कौशल है जो स्वत ही आता है, मैं अतुल जी के प्रयास को नमन करता हूँ उन्होंने विष्णु जी को याद करने के लिए सही जगह चुनी है और आप सभी को अपनी शुभकामनाये प्रेषित करता हूँ !

इसके पश्चात् गोष्ठी के अध्यक्ष वरिष्ठ व्यंग्यकार साहित्यकार प्रेम जनमेजय जी ने अपना वक्तव्य दिया ! प्रेम जी ने कहा वो सभा निश्चित रूप से बहुत अच्छी होती है गुणवता पूर्ण होती है, जिसमे प्रबुद्ध लोग भागीदारी करते है मैं आभारी हूँ अतुल जी का उन्होंने मुझे अवसर प्रदान किया ऐसे आयोजन का हिस्सा बनने का, आजकल का समय अवसाद पूर्ण है और ऐसे में जब ऐसी रचनाये आती है सामने जो संवेदनाओं को छूती है अपने एकांकीपन में जब आप ऐसी रचनाये सुनते है जो मन को छूती है तो बल मिलता है आज इस तरह की गोष्ठियों आयोजनों की बहुत आवश्यकता है, आज हमारे समाज से हमारे बीच से जो गायब हो रहा है वो है संवाद और जिसके चलते फेसबुक जैसी प्रिंट मिडिया साईट वजूद में आ रही है जहाँ प्रतिक्रिया तुरंत मिलती है, आजकल जहाँ समय नहीं है अपने विषय में सोचने का वहीँ दुसरो के विषय में सोचना बड़ी बात है जो अतुल जी कर रहे है, बधाई देता हूँ आभार प्रकट करता हूँ ! साहित्य में खुद ही दिशा ढूंढ रहा हूँ, आज जो रचनाये मैंने सुनी उनके विषय में कुछ सामान्य बातें मैं कहना चाहूँगा रचना को पढने के साथ एक चीज अपने आप जुडती है वो है परफोर्मिंग आर्ट पढ़ना मंच पर भावो को संप्रेषित करना एक कला है कहाँ रुकना है कहाँ प्रभाव छोड़ना है जितने भी रचनाकार पढ़ रहे है उन्हें सुधारना है! वर्तमान को देखने की शक्ति युवाओं के पास है, नई तकनीक का प्रयोग अविनाश वाचस्पति की रचनाओं में देखने को मिलता है, युवा दृष्टि आपके पास है और परिपक्वता मेरे पास, बाधित दृष्टिकोण धृतराष्ट्र दृष्टिकोण है युवा आज के बहुत अच्छा लिख रहे है, अपनी पत्रिका में युवाओं की ५४ रचनाये हमने रखी है ! युवा सोच जरुरी नहीं अपरिपक्व हो ! हास्य और व्यंग में जमीन आसमां का अन्तर है हास्य आदि मानव से आरम्भ हुआ है और व्यंग्य समाज का हथियार है, व्यंग्य प्रहार करता है हास्य रस देता है दोनों का उपदेश्य अलग होता है ! आज के सन्दर्भ में कहे तो हास्य का अश्लीलीकरण हो गया है, आपको स्तर बनाना है उसे गिराना नहीं है, व्यंग्यकार मिथ को तोड़ता है, फंतासी का प्रयोग अपनी रचना में अविनाश ने कुशलता से किया, उन्होंने सभी रचनाकारों से आग्रह किया की अपनी रचना को तत्कालिता में मत बांधिए ! अपनी समय की राजनैतिक विसंगतियों पर प्रहार करना अलग बात है, आप लिख क्या रहे है ये बड़ी चीज है, और विवशता पर व्यंग्य ना करे कभी ! इसी के साथ सभी रचनाकारों का हौसला बढाते हुए और शुभकामनाये देते हुए उन्होंने अपना वक्तव्य समाप्त किया !
और अंत में अतुल जी ने धन्यवाद ज्ञापन देते हुए आयोजन समाप्ति की घोषणा की !