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सन्निधि संगोष्ठी में आप सभी का स्वागत एवं अभिनन्दन।

Monday, 20 October 2014

मौत

ताउम्र बेचारगी से अपनी, लड़ता है आदमी,
मौत से पहले भी कई मर्तबे, मरता है आदमी, 
क्यूकि कहीं ना कहीं जिन्दा, आज भी उसका ज़मीर है, 
जाने कब से आत्महत्या और उसके बीच, महीन सी एक लकीर है, 
लीक से हटकर कभी वो चला नहीं, अपनी ही जात का अलमस्त वो फ़कीर है !

सर पर आज भी उसके लटकती, बेबसी की नंगी शमशीर है, 
बंदर के बच्चे से सभ्य इंसान बनने की जुगत भिड़ाता, वो बेसऊर है, 
आदमियत पर अपनी इतराता, फक्त इतना सा उसका कसूर है, 
पल-पल मरने की बेबसी को घूरता, गरियाता है, 
अपने कर्मो की रस्साकसी में उलझा, वो दरिद्र सा बुदबुदाता है !

क्युकि मौत तो शाश्वत है, 
क्यूकि मौत को तो आना ही है,
क्यूकि मौत तो आकर रहेगी ही,
दबे पाँव ही सही बिल्ली की तरह आएगी,
और आँख बंद किये कबूतर से मानव को, दबोच अपने पंजो में ले जायेगी !

जिन्दगी क्या है ? बस कर्मो का मेला है,
जिन्दगी की दौड़ में स्पर्धा अव्वल आने की,
हांफता दौड़ता जीव सिसकता सा अकेला है,
चूहे बिल्ली सी दौड़ अभी जारी है,
कभी चूहा तो कभी बिल्ली चूहे पे भारी है !

फिर क्या, मौत से पहले मरना जीना, 
आत्मा तो अजर है अमर है ना, 
उतार पुराना चौला नए में ढल जायेगी, 
या विचरते भटकते युहीं किसी दिन शून्य में विलीन हो जायेगी,
अंतिम ध्येय तो बस निर्विकार भाव से अनंत में एकाकार होना है, 
फिर कैसी आदमियत और कैसा मारना जीना ?

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Monday, 29 September 2014

औरत

औरत में जन्मजात होता है
एक गुण, ढलने का
समय के साथ वो
ढलती है नित नए रूप में

बालपन में ही दायरे
बना जाते है उसे व्यस्क
यहाँ मत जाओ, ये मत करो
ऐसे मत चलो, ऐसे मत हंसो

और वो ढलती हंसकर
हर परिधि में सिमटती
बेड़ियाँ सजाये पैरो में
रखती कदम फूंक फूंक कर

अनायास जब कदम उसके
पड़ जाते जलते कोयलों पर
तो सुलग उठता वजूद उसका
जलते अंगारों सी आंखें
हर तरफ से बेध देती
उसका शरीर

ढांपती उसे वो
कांपते हाथों से गिरती
संभलती उठती
लड़खड़ाते, कदमो को साधती
खुद ही चलती

सूर्य के उदयमान होने के साथ
खिलती धूप सी एक आंगन से
निकल दूसरें आँगन में
तुलसी के पौधे सी रोप दी जाती है

और वो ढल जाती है
हो जाती है उसी आँगन की
नए रिश्तों में बंधती
हर रिश्ते को अपने आंचल में
सहेजती बांधती

अपनी आँखों की गहराई में समेटती
ख़ुशी गम के साथ कितने ही फ़साने
जिन्दगी की माला में पिरोती
अनुभवों के मोती

ढलती शाम सी रखती
तह लगा ग़मों को अपने
सीले से गम
आँखों की नमी पा छलक ना जाए
इसीलिए हंसी की चादर उड़ा
सब ढांप लेती अपने अंतस में

करती रोशन चांदनी सा नेह बरसाती
मुस्कुराती ढलती
रिश्तों के धागे से बांधती जीवन को
रात में करवटें बदलती
सुबह के इंतज़ार में

औरत ढलती है उम्र के हर पड़ाव में
मौसम की रुतों सी
और एक दिन पा जाती सुकून रूह उसकी
जब बंधनों को तोड़ उन्मुक्त सा
चल पड़ता है उसका मन
हर मोह से विमुख हो एक अंतहीन सफ़र पर
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Tuesday, 16 September 2014

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट माह : अगस्त २०१४




सन्निधि संगोष्ठी अंक : 17
दिनाँक / माह :  31 अगस्त रविवार 2014
विषय :  सोशल मीडिया और लेखन

नए रचनाकारों को प्रोत्साहित करने के मकसद से पिछले पंद्रह महीने से लगातार संचालित की जाने वाली संगोष्ठी इस बार ‘सोशल मीडिया और लेखन’ विषय पर केंद्रित थी। ये संगोष्ठी 31 अगस्त रविवार सन्निधि सभागार में डॉ. विमलेश कांति वर्मा, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी अकादमी, दिल्ली, की अध्यक्षता में सफलता पूर्वक संपन्न हुई .......

स्वागत भाषण के दौरान विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के मंत्री अतुल कुमार ने घोषणा की कि विष्णु प्रबाकर की स्मृति में जो सम्मान शुरू किया गया है, वह अब हर साल दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि इसी के साथ दिसबंर में काका कालेलकर के जन्मदिन पर भी काका कालेलकर सम्मान दिए जाएंगे।

संगोष्ठी के संचालक और वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने कहा कि सोशल मीडिया का दायरा केवल संपन्न और पढ़े-लिखे लोगों तक सीमित है लेकिन यहां संकीर्ण सोच के कारण उत्पन्न त्रासदी की चपेट में वे लोग भी आ जाते हैं, जिनका इससे कोई लेना-देना नहीं होता।

विषय प्रवेशक के रूप में शिवानंद द्विवेदी सेहर ने अपने वक्तव्य में कहा कि फेसबुक और ट्विटर ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मायने दिए लेकिन सोचनीय ये है, कि हम उस स्वतंत्रता का उपयोग कैसे करते है ? सोशल मीडिया के माध्यम से संपादक जो मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे उनके बीच से हट जाने से सीधे अपनी बात कहने और रखने की स्वतंत्रता मिली लेखक को, वो खुलकर बिना काट छांट के अपनी बात कह सकता है, सोशल मीडिया पर लेखन की शुरुआत से होने से संपादकीय नाम की संस्था ध्वस्त हो गई। लेखन उनके दायरे से मुक्त हो गया है।

वहीँ मनोज भावुक जी ने कहा कि सोशल मीडिया पर भी अनुशासन की जरूरत है, अभिव्यकित की जो आज़ादी है वो खतरा ना पैदा करे, संपादक का ना होना वरदान बिलकुल नहीं है, संपादक जब काट छांट करता है तो वो एक लेखक की कला में निखार लाता है, और यहाँ जब संपादक बीच में नहीं है तो हर व्यक्ति दो लाइन लिखकर खुद को एक लेखक या कवि की श्रेणी में रख गौरान्वित महसूस करता है, सोशल मीडिया ने जहां अभिव्यक्ति का मौका दिया है , वहीं लोग भी इसके कारण एक-दूसरे के करीब आए हैं, मैं जब युगांडा जैसी जगह में था तो अपने क्षेत्र के लोगो को ढूँढने में सोशल मीडिया ने और मैंने वहां युगांडा भोजपुरी एसोसिएशन की स्थापना की, तो जनाब ये मीडिया की ताक़त है लेकिन बात यहाँ ताक़त की नहीं नियंत्रण की है .......

अलका सिंह जी ने कहा सोशल मीडिया जहाँ स्त्रियों का शोषण करता है वहीँ शैलजा पाठक जैसी अच्छी लेखिका को प्रोत्साहन भी देता है, सोशल मीडिया ने स्त्रियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है ! सोशल मीडिया आज जिस दौर से गुजर रहा है वहां हमें बहुत सी चीजों को स्पष्ट करने की आवश्यकता है ! जरुरत है आज सोशल मिडिया की दिशा तय करने की आज जो ज्वलंत मुद्दे है उन्हें कैसे स्थान दिया जाए सोशल मीडिया पर ये जानना जरुरी सबसे !
पारुल जैन ने भी स्त्री पक्ष को ही प्रधान रूप में रखकर बात रखी अपनी उन्होंने कहा यहाँ जो वैचारिक स्वतंत्रता मिली है उसका दुरूपयोग ना हो इसको ध्यान में रख चलना है सबको ! शिरेश ने सत्ता के विकेंद्रीकरण को केंद्र में रखकर अपनी बात शुरू की और बहुत हद तक सही दिशा में अपनी बात को रखा ....

शुभुनाथ शुक्ल जी ने अपने वक्तव्य में कहा सोशल मीडिया और लेखन पर यहाँ तमाम सवाल उठाये गए, मैंने जब 30 साल पहले जब जनसत्ता ज्वाइन किया तब जनसत्ता एक नया प्रयोग था, उसमे पाठकीय पत्र के लिए एक मंच रखा गया जिसका नाम था चौपाल, चौपाल पर इतने पत्र आते थे चौपाल भर जाती थी, सेंकडो पत्र एक ही इशू पर आते थे, हमें कई बार पत्रों को एडिट करना पड़ता था और कई बार रोकना भी पड़ता था, लेकिन आज फेसबुक जैसी संस्था के आने से संपादक जैसी संस्था हट गई है, अब आप अपने मन से जो चाहे लिख सकते है, इसके लाभ भी है और दुर्गुण भी, समाज बनता है लोगो से उनकी सोच से उनके विचारों से, लिखने पढने में गर आपको असीमित वर्ग तक पहुच बनानी है, तो फेसबुक एक शसक्त माध्यम है उसके लिए, और मैंने इसका भरपूर उपयोग किया अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए, इसमें कोई शक नहीं की फेसबुक ने एक नया आयाम दिया है ! राजनेताओं ने फेसबुक का सबसे सही और भरपूर इस्तेमाल किया है ! तो यहाँ असली लेखक वहीं है जो राजनेताओं के प्रभाव से मुक्त हो और इस मंच से अपनी बात जिस तरह से कहना चाहता है कह सके !

पद्मा सचदेव जी ने अपने वक्तव्य में कहा मुझे यहाँ आकर अच्छा इसीलिए लग रहा है यहाँ उपस्थित सभी लोग उसी तरह एकत्र है जैसे आग तापने को लोग इकठ्ठा होते है और सार्थक चर्चा करते है, सोशल मीडिया और लेखन दोनों ही अलग विधाए है, सोशल मीडिया का आज बोलबाला है, सोशल मीडिया में जितने माध्यम है उनकी अपनी अलग ताक़त है, और लिखा हुआ वो जब चाहे बदल भी सकते है, और पुनर्विचार भी कर सकते है, इलेक्ट्रॉनिक मिडिया में कभी कभी सच पूरी तरह उजागर नहीं होता. पर जो भी जितना भर होता है उसका असर तुरंत होता है, सोशल मीडिया में लोगो को भड़काने का काम नहीं होना चाहिए, खबरे तोड़ मरोड़ कर ना दी जाए, भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए, मिडिया की शक्ति का सदुपयोग हो ये सबसे जरुरी है, पहले एक समय में बलात्कार जैसी घटनाएं होती थी, तो उन्हें दबा दिया जाता था, लेकिन आज ऐसी खबरों को छिपाया नहीं जाता बहुत तीव्र प्रतिक्रिया आती है, एक नई सोच नई क्रांति दिखती है, रहा लेखन तो लेखन आपको हमेशा लपेटे रखता है, जाने कब वो लम्हा आ जाए जब आप कुछ लिख पाए, लेखन मिडिया से अलग एक रचनात्मक क्रिया है, कभी यूँ भी लगता है ये एक लम्हा है, जो आपके पास आता है एक छोटे बच्चे की तरह और आँचल पकड़ आपके साथ साथ चलता है, इस लम्हे में आप जितना डूबते है उतनी रचना भीगी हुई होती है, उस लम्हे का इंतज़ार लेखक हमेशा करता है, ये मैं अपने अनुभव से कह रही हूँ कविता आपके पास आती है , उसमे थोड़ी सोच आप लाते है लेकिन कविता आपके अन्दर जो बहुत समय से घुमड़ता है उसकी देन होती है ! आजकल मुक्त छंद या अजान पहर की कविता प्रचलन में है, पहले हम छंद युक्त कविताएं ही लिखते थे जिसमे मेहनत अधिक थी, कविता खुद अपने आप ही जन्मती है इसे एक शेर के साथ कह अपनी बात ख़त्म करुँगी ..........
कि टूट जाते है कभी मेरे किनारे मुझमे
डूब जाता है कभी मुझमे समंदर मेरा ............

डॉ विमलेश कांति ने अपने वक्तव्य में कहा आज मुझे यहाँ आकर बहुत सुखद अनुभूति हो रही है यहाँ आज नए मीडियाकर्मी और नई पीढ़ी के लोग अपनी बात कह रहे है हम वृद्ध लोगो के समक्ष ये अच्छी बात है, ईश्वर ने हमें एक मूह दो कान दिए है शायद इसीलिए हम कम बोले और अधिक सुने, गांधी जी भी यहीं कहते थे, मीडिया और लेखन दो ऐसे विषय है, उनमे शक्ति अपरिमित है, लेकिन शक्ति का नियत्रण कैसे हो ? कैसे हम उसे सही मार्ग पर ले जाए, ये सोचने की बात है !

कार्यक्रम का संचालन किरण आर्या और अरुन शर्मा अनंत ने किया। इंडिया अनलिमिटेड की संपादक ज्योत्सना भट्ट ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस मौके पर उपलब्धियों और प्रोत्साहन के लिए भोपाल के डा सौरभ मालवीय(पत्रकारिता), भागलपुर के मनोज सिन्हा(फोटो पत्रकारिता)और साहित्य के लिए प्रज्ञा तिवारी, राजेंद्र सिंह कुंवर फरियादी और कौशल उप्रेती विष्णु प्रभाकर सम्मान से सम्मानित किए गए। इन सभी को ये सम्मान समारोह की मुख्य अतिथि पदमा सचदेव और साहित्यकार गंगेश गुंजन ने दिया।


प्रस्तुति : किरण आर्या

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट माह : जुलाई २०१४

सन्निधि संगोष्ठी अंक : 16
दिनाँक / माह :  19 जुलाई 2014
विषय :   कहानी
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नमस्कार मित्रो दिनांक 19 जुलाई 2014 को सायं 5.00 बजे से राजघाट 1 जवाहरलाल नेहरु मार्ग, अम्बेडकर स्टेडियम के समीप गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा के सन्निधि सभागार में कहानी पर आधारित सन्निधि संगोष्ठी सफलतापूर्वक संपन्न हुई, गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा की मंत्री कुसम शाह के सानिध्य में आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता भाषाविद नारायण कुमार जी ने की, और मुख्य अतिथि के तौर पर नाटककार और कहानीकार असगर वजाहत साहब हमारे बीच उपस्थित रहे !

अतिथियों, प्रतिभागियों और श्रोताओं का स्वागत भाषण विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के मंत्री अतुल कुमार ने किया, अतुल जी ने अपने वक्तव्य में कहा सन्निधि अब तक सफलता पूर्वक मासिक गोष्ठी करती आई है अब जरूरत है हम भविष्य में होने वाली गोष्ठियों की दिशा बदले, गोष्ठी किसी विषय वस्तु पर केन्द्रित हो, उसमे विधा का बंधन ना हो, विषय वस्तु प्रमुख रहे, अगर हम हिंदी के अलावा अन्य प्रदेशों की भाषाओं को लेकर भी चले तो हम सार्थक प्रयास कर पायेंगे!

कार्यक्रम का संचालन प्रसून लतांत और किरण आर्या ने किया। गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान की ओर से आयोजित होने वाली इस बार की संगोष्ठी कहानी विधा पर केंद्रित थी और इसमें चार नए रचनाकारों ने अपनी-अपनी कहानियों का पाठ किया। संगोष्ठी में जाह्नवी सुमन की ‘अपना घरौंदा’, अनघ शर्मा की ‘चीनी मिट्टी रेशम पानी’, शोभा रस्तोगी की ‘डायन’ और राजीव तनेजा की ‘अलख निरंजन’ चार अलग तरह की कहानियां पढ़ी गई !

इस संगोष्ठी में गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा की मंत्री कुसुम शाह जी के साथ अतुल प्रभाकर, लतांत प्रसून, आराधना प्रभाकर, अनीता प्रभाकर, सोमा विश्वास, राजीव तनेजा, रचना आभा, वी के बोंस, उर्मिला माधव दी, विवेक रॉय, नीरव कुमार, रुपेश कुमार, अशोक झा, परीक्षित नारायण सुरेश, अरुन कुमार, शिवानंद सहर द्विवेदी, बीना हांडा, राजेन्द्र कुंवर फरियादी, वीरेंद्र सिंह, इंदु कड्कल, निर्मल कान्त, अटल गाँधी जी के साथ अन्य कई मित्र शामिल रहे !

इसके पश्चात् असगर वजाहत जी ने अपना वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा जितनी भी कहानियां यहाँ पढ़ी गई, और जो आयोजक है वो सब बधाई के पात्र है, वो एक ऐसे कार्य में संलग्न है जो सराहनीय है, समाज को बदलने का काम साहित्य और संस्कृति करती है, हम लोग जिस साहित्य की प्रगति में लगे है, वो जड़ों से बदलने का काम कर रहा है, उनका कहना है कि राजनीति समाज में ऊपर-ऊपर बदलाव लाता है पर साहित्य यह काम नीचे से करता है। उन्होंने समाज में बेहतर बदलाव के लिए साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों की सक्रियता की जरूरत बताई। असगर वजाहत ने कहा कि जानकारियों की लगातार बढ़ती उपलब्धता के दौर में कहानीकारों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। उन्हें यह सोचना पड़ रहा है कि कहानी के जरिए वे अपने पाठकों को क्या देना चाहेंगे, क्योंकि बहुत-सी जानकारियां अब लोगों को विभिन्न स्रोतों से मिल जाती हैं। कहानी के शिल्प की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कहानी भाषण नहीं है। भाषण के समाहित होने से डू और डोंट के जुड़ते ही कहानी की ताकत कम हो जाती है। उन्होंने कहा कि पाठक को कहानी में गैर जरूरी चीजों में नहीं अटकाया जाना चाहिए। उन्होंने नए रचनाकारों से कहा कि केवल घटना बता कर कहानी लिखेंगे तो पाठक भ्रमित हो जाएंगे। वजाहत ने कहा कि लेखक को खिलाड़ियों की तरह ही कठिन परिस्थितियों में से गेंद को निकाल कर अपने कब्जे में लेकर गोल करना होता है। लेखक को संतुलित संयम के साथ अपने लक्ष्य तक पहुंचना होता है। उन्होंने कहा कि कहानी लिखने के पहले हमें इस बात पर जरूर गौर करना चाहिए कि हमें कहानी में क्या नहीं कहना है! कहानी का औचित्य क्या है? कहानी पाठक को सोचने पर विवश करे, आज का युग सूचनाओं का युग है, सर्च इंजन से सर्च करने पर हर तरह की सूचनाये उपलब्ध हो जाती है, आप जो कहे वो किसी सर्च इंजन से ना मिले, एक कहानी जो आप लिख रहे है अपने लिए नहीं पाठकों के लिए लिख रहे है, और पाठक को बांधे रखना सबसे मुश्किल काम होता है, आपके लिए अपनी बात कहना एक कला है, बहुत से लोग सोचते है कागज़ कलम हाथ में है तो कुछ भी लिख सकते है, आपको उपदेश्य तय करना है, अपनी कहानी का, जितने संयम से आप चलेंगे उतनी क्षमता से आप अपने लक्ष्य तक पहुँच पायेंगे, पाठक को गैर जरुरी बातों में भटकाना लक्ष्य से दूर ले जाता है, इसीलिए कहानी लिखते समय हम संवेदनशील बने अच्छा लिखने का सबसे सरल माध्यम है अच्छा लिखा पढना, उसकी रौशनी में आप जान पायेंगे की अच्छा लेखन किस प्रकार किया जाता है, मुझे ख़ुशी हुई ये देखकर युवा पीढ़ी अच्छा लिखने का प्रयास कर रही है !

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे नारायण कुमार जी ने अपने वक्तव्य में कहा, मुझे याद आता है, जब मैं पढ़ रहा था, तो उस दौरान हमारे एक मित्र बोले तुम पी एच डी कर लो, उस समय कथा की समीक्षा का कोई मापदंड नहीं था, उसी समय में धर्मवीर भारती ने धर्मयुग के नाम से एक पत्रिका का संपादन शुरू किया, और मोहन राकेश ने सरिता में "आईने के सामने" एक स्तंभ शुरू किया जिसमे उन्होंने पूछा तुम क्यों लिखते हो? तो नागार्जुन ने कहा राकेश तुम शरारती हो, तुमने मुझे आईने के सामने खड़ा कर दिया ! एक कहानी का निरूपण चार तत्व करते है, ईश्वरीय तत्व, राजनैतिक तत्व, उत्सुकता और वल्गरिटी इन सबका मिश्रण कहानी की दशा दिशा तय करता है, हिंदी कहानी में अंग्रेजी शब्दों का बहुतायात में प्रयोग कहानी के पक्ष को निर्बल कर देता है, जो शब्द आप उपयोग में लाते है, वहीँ कहानी को प्रवाह प्रदान करते है ! अपनी जो आंचलिक कहानियां है, उनमे शब्दों के पर्याय ना लिखा जाना पाठकों के लिए असमंजस की स्थिति पैदा करता है अक्सर, इसीलिए कहानी जिस भाषा में हो उसे उसी भाषा में ही लिखा जाना चाहिए ! मैं धन्यवाद करता हूँ आयोजको का जिनकी वजह से मैं असगर वजाहत जी के संसर्ग में बैठा हूँ, और एक गैर कथाकार आदमी होने के बावजूद कहानी के विषय में कह सुन रहा हूँ !

संगोष्ठी के अंत में लतांत प्रसून जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया !

प्रस्तुति : किरण आर्या

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट माह : जून २०१४

नमस्कार मित्रो एक बार फिर जून माह में हुई सन्निधि संगोष्ठी की विस्तृत रिपोर्ट आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है, क्षमा प्रार्थी हूँ पिछले कुछ समय से व्यस्तता के चलते रिपोर्ट प्रस्तुत करने में देरी हो रही है !

21 जून 2014 को होने वाली सन्निधि संगोष्ठी सफलता पूर्वक संपन्न हुई, गोष्ठी के प्रारंभ में विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के मंत्री अतुल कुमार ने पिछले पंद्रह महीनों से लगातार संचालित की जा रही सन्निधि संगोष्ठी की उपलब्धियों की जानकारी देते हुए अपने पिता विष्णु प्रभाकर के योगदान को याद किया। संचालन कर रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने मीडिया, संस्कृति, साहित्य और भाषा के सवाल को अहम बताते हुए कहा कि अब इन सब मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने का निर्णायक समय आ गया है।

अशोक कुमार झा जी ने अपने वक्तव्य में कहा विष्णु प्रभाकर जी के १०३ वें जन्मदिन पर काका साहेब कालेलकर की कर्मस्थली में "द डे आफ्टर मंथ" के दो साल पूरे होने के उपलक्ष्य में और सन्निधि की १५वीं गोष्ठी के अवसर पर मैं आप सभी का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ, ये समारोह आप सभी के बिना पूरा नहीं होता, "द डे आफ्टर मंथ" के प्रकाशन को दो साल पूरे हुए, इन दो सालों में न्यूनतम साधन से इस पत्रिका के लगातार 24 अंकों का प्रकाशन करना हमारे लिए अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा, इस पत्रिका में राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक ख़बरों और लेखों के प्रकाशन के साथ साहित्य और संस्कृति को भी प्रयाप्त महत्व दिया जाता रहा है, अभी हमने फैसला किया है समय समय पर उन साहित्यकारों पर विशेषांक निकाला जाए जिनके जन्म को सौ वर्ष पूरे हो चुके है, और इसी कड़ी में प्रथम बार जून का अंक विष्णु प्रभाकर पर केन्द्रित किया गया, आज चिंता का विषय है, आज पात्र पत्रिकाओं में साहित्य और संस्कृति को बहुत कम महत्व दिया जा रहा है, जबकि हकीकत ये है अपने देश में हिंदी पत्रकारिता को स्थापित करने में साहित्य और संस्कृति से जुड़े पुरोधाओं का योगदान रहा है, अगर साहित्य और संस्कृति का प्रवाह बहता रहे, तो इससे समाज न सिर्फ समृद्ध होता है, अपितु इसे दिशा भी मिलती है, इसीलिए आज के समारोह में होने वाली संगोष्ठी का विषय "मीडिया साहित्य संस्कृति और भाषा" रखा गया है, हमें उम्मीद है संगोष्ठी में हमारे विद्वान अतिथियों द्वारा जो विचार रखे जायेंगे, वें हम सभी के लिए कारगर साबित होंगे !

प्रेमपाल शर्मा जी ने अपने वक्तव्य में हिंदी की दिशा दशा पर चिंता व्यक्त की, उन्होंने कहा पिछले दिनों साहित्य ही गायब नहीं हो रहा है, अपितु साहित्यकारों की स्मृतियाँ भी गायब हो रही है सिरे से, कुछ समय पूर्व मेरा बनारस जाना हुआ, बनारस हिंदी का गढ़ माना जाता रहा है, वहां पुस्तकालय के नाम पर २०-२० किताबें थी और उनकी भी जिल्द फटी हुई थी, मेरी ये टिपण्णी यहाँ इसीलिए आवश्यक है क्युकि हिंदी आज विस्मृति के दौर पर है हिंदी का जो नुक्सान हो रहा है, किसी विधा के खिलाफ जो गोलबंदी है, उससे सुराख़ करने की शुरुवात हो चुकी है, गाँधी जी और उनके अनुसरण करने वालो से हमने सीखा अपनी सतह से चिपककर रहना, पात्र पत्रिकाएं भी धर्म की तरह हमारे भीतर प्रवेश कर जाती है, प्रेमपाल जी ने चिंता जाहिर की कि न केवल साहित्य, बल्कि साहित्यकारों की स्मृतियां भी गुम हो रही हैं। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दृढ़ता के अभाव में आज हमारी हिंदी की दुर्गति हो रही है।

वरिष्ठ साहित्यकर और समयांतर पत्रिका के संपादक पंजर बिष्ट ने अपने वक्तव्य में कहा विष्णु जी के साथ मेरी मित्रता रही और एक लम्बे समय तक रही, लगभग २०-२५ साल बैठा करता रहा मैं उनके साथ कॉफ़ी होम में ये कोई छोटा दौर नहीं था ये मान लीजिये मैंने अपनी जवानी का एक विशिष्ट समय उनके साथ बिताया और विष्णु जी तो लगातार जवान ही रहे, असल में विष्णु जी जिस तरह के व्यक्ति थे, ७७ के बाद जब आपातकाल के दौरान ही उनसे मेरा सम्बन्ध बना मैंने विष्णु जी से ये सीखा एक लेखक होने के लिए सबसे जरुरी ये है, आप कितने उदार हो, कितने लोगो के साथ आप मिल सकते है, क्युकि विष्णु जी कॉफ़ी हाउस में बैठते थे और उनके साथ कोई भी बैठ सकता था, और उनसे बात कर सकता था, अक्सर सारे हिन्दुस्तान से लोग वहां आते थे, उनके बहुत से मित्रो से मेरा परिचय कॉफ़ी हाउस में ही हुआ, ऐसे ही त्रिवेंद्रम के उनके एक मित्र से मेरा परिचय वहां हुआ और बाद में एक बार त्रिवेन्द्रम जाने पर उन्ही मित्र ने हमारी बहुत सहायता की, विष्णु जी की मित्रता का दायरा बहुत बृहद था, उनके जैसे दायरा तभी बन सकता है जब आप उदार हो या फिर आपकी रचनाओं से लोग परिचित हो, दूसरी बात जो लेखक के तौर पर मैंने उनसे सीखी वो ये है, एक लेखक अपने विचारो में लगातार उदार होता है, और वो एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए जहाँ समानता हो, ऐसे समाज निर्माण के लिए वो सतत प्रयत्नशील होता है, और कल्पनाशीलता के साथ उसी के लिए वो जीवन भर काम करता है, विष्णु जी की रचनाओं में लगातार आप ये बात देखेंगे, उन्होंने जातिप्रथा स्त्री पुरुष के बीच के अंतर को मिटाने का प्रयत्न किया ये अपने आप में एक बड़ी बात थी, तीसरी बात ये है आप देखिये लेखक की दुनिया सीमित नही होती, वो कितना विशाल होता है इसका उदाहरण कि विष्णु प्रभाकर जी शरत जी के जीवन से प्रभावित रहे, और उनकी जीवनी पर उन्होंने काम किया, ऐसे कठिन दौर में जब उनके पास आय का कोई निश्चित साधन नहीं था, और परिवार की जिम्मेदारियां भी थी, वो जिस तरह से बांग्लादेश और वर्मा तक गए, और शरत जी के जीवन सम्बंधित जानकारी एकत्र करी, और बाद में आवारा मसीहा जैसी कृति समाज को दी वो अपने आप में एक मील का पत्थर है, एक लेखक के नाते आपको खुला और विश्वसिक दृष्टि का होना चाहिए, ये वो बातें है जो संस्मरण रूप में मैं आज विष्णु जी की १३०वी जन्मशती के अवसर पर उन्हें श्रधान्जली रूप में उन्हें अर्पित करना चाहता हूँ, जब भी विष्णु जी को याद करता हूँ मुझे लगता है मैंने उनके साथ एक पूरी शताब्दी पार कर दी हो, मैं उनके निकट रहा ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है, आज जो विषय है उसपर बात करना थोडा सा विकट है, आज जो दौर है वो मीडिया का दौर है, आज बेव पत्रकारिता पूरी तरह से हमारे जीवन को प्रभावित है करती है, संस्कृति को बचाने में राष्ट्रभाषा हिंदी का अहम योगदान रहा है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ओर से संस्कृति पर हो रहे लगातार हमले पर अफसोस जताते हुए कहा कि देश में त्रिभाषा प्रणाली लागू नहीं की गई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा का अधिकार अपनी मातृभाषा में ही हासिल करने की कोशिश होनी चाहिए।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए केके बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक डा सुरेश ऋतुपर्ण ने कहा कि हिंदी का सवाल अहम है। इसकी समृद्धि के लिए निरंतर प्रयास होने चाहिए। उन्होंने कहा कि भाषा गई तो संस्कृति भी नहीं बचेगी। डा ऋतुपर्ण ने भारत से बाहर के देशों में हिंदी के बढ़ते प्रचार-प्रसार के बारे में विस्तार से बताया।

गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान की ओर से आयोजित समारोह में विष्णु प्रभाकर पर केंद्रित ‘द डे आफ्टर मंथ’ के विशेषांक का और उत्तर प्रदेश में छप्पन गांवों में पुस्तकालय अभियान को संचालित करने वाली संस्था कर्तव्य की ओर से प्रकाशित पत्रिका का लोकार्पण किया गया। साथ ही गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा की मंत्री सुश्री कुसुम शाह के सानिध्य में समाजसेवा, पत्रकारिता और अन्य क्षेत्रों में उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे युवाओं में शूमार कुमार कृष्णन, अमृता , राजीव तनेजा, अरुण शर्मा अनंतसुशील जोशी, सज्जन कुमार गर्ग, सोमा विस्वास, बीएम मिश्रा, अनिल कुमार बाली और अशोक झा को सम्मानित किया गया।

समारोह के आखिर में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें हर्षवर्धन आर्य, इंदू सिंह, सुशील जोशी, संतोष सौम्य, सरोज सिंह, रुप आहूजा, अनिल कुमार बाली, राहुल उपाध्याय, अरुण शर्मा अनंत, निवेदिता मिश्रा झा और सोमा विस्वास ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया। काव्य गोष्ठी का संचालन सन्निधि संगोष्ठी की संयोजिका किरण आर्या ने किया। धन्यवाद ज्ञापन द डे आफ्टर मंथ की महाप्रबंधक सारिका ने किया। समारोह में रमेश शर्मा, गंगेश गुंजन और नारायण कुमार सहित हंस पत्रिका के कार्यकारी संपादक संगम पांडेय के साथ बहुत से मित्र भी मौजूद थे जिनमे आलोक खरे, डी के बोस, नरेन् आर्य, राजेन्द्र कुंवर फरियादी, प्रेम सहेजवाला, संजय गिरी भी मौजूद थे।

प्रस्तुति : किरण आर्या

Thursday, 5 June 2014

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट माह : मई २०१४


 सन्निधि संगोष्ठी अंक : 14
दिनाँक / माह :  24 मई 2014
विषय :  कविता
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नमस्कार मित्रो 24 मई को होने वाली सन्निधि संगोष्ठी सफलतापूर्वक संपन्न हुई, यह गोष्ठी कविता पर आधारित रही, इस गोष्ठी में वरिष्ठ कथाकार और कवयित्री कमल कुमार जी अध्यक्ष के रूप में और कवि-गजलकार और आकाशवाणी के उप महानिदेशक लक्ष्मी शंकर वाजपेयी मुख्य अतिथि के रूप में हमारे बीच रहे, इसके आलावा अतिथि कवियों के तौर पर ममता किरण, निरुपमा सिंह और केदार नाथ कादर जी भी हमारे बीच रहे .....

इसके अतिरिक्त गंगेश गुंजन, ममता किरण, निरुपमा सिंह, केदारनाथ कादर, अतुल प्रभाकर, वंदना ग्रोवर, नीरज द्विवेदी, कौशल उत्प्रेती, संगीता शर्मा, रश्मि भारद्वाज, सुशीला श्योराण, आलोक खरे सहित संगोष्ठी का संचालन कर रहीं किरण आर्या ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया। इन सभी की कविताओ देश की चिंता समाई थी और भविष्य के प्रति उम्मीदें थीं।
इस संगोष्ठी में श्रोता रूप में अनुराधा प्रभाकर, सुरेश चंद्रा, सीमान्त सोहल, उर्मिला माधव, राजीव तनेजा, अविनाश वाचस्पति, आनंद कुमार द्विवेदी, मृदुला शुक्ला, कामदेव शर्मा, देवेन्द्र तिवारी, सोमा दास, रश्मि नाम्बियार, मेरी प्यारी सखी कुसुम कुशवाहा और अन्य कुछ मित्रो ने शिरकत की !

संगोष्ठी के प्रारंभ में संगोष्ठी के मकसद को उजागर करते हुए वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने कहा कि आज किताबों में कविता देखने को मिलती है पर जीवन में वह खत्म हो गई है। स्वागत अतुल प्रभाकर ने किया, और अपना एक भाव भी हम सभी के समक्ष रखा, गोष्ठी की संयोजिका किरण आर्य ने काव्य पाठ के लिए मित्रो को आमंत्रित किया और अपने कुछ भाव भी रखे हम सभी के समक्ष !
इसके पश्चात् मुख्य अतिथि लक्ष्मी शंकर बाजपई जी ने अपना वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा मैं आभारी हूँ, पहले मैं साझा करना चाहूँगा एक सवाल कि भविष्य में कविता का स्वरुप क्या होगा? कविता रहेगी या नहीं? इसमें कोई संशय नहीं है, कविता का सम्बन्ध भावो से है इसीलिए कविता का अस्तित्व हमेशा विद्धमान रहेगा, जीवन में जितनी पेशोपेश या समस्या है उनका निदान कविता और साहित्य में है, जो साहित्य कला से जुड़ा नहीं है वो ह्रदय पशु समान है, कविता पर आज जो संकंट है गहरा है, वो सोचनीय है, मैं विश्व कविता महोत्सव में गया, तो वहां कविता का जो रूप देखा बेहद खूबसूरत था, पूरा देश कविता में था, दिल्ली और पूरे देश में ऐसे प्रयास की जरूरत है, जरुरी है कविता को स्कूल कॉलेज और आम जन तक पहुचाया जाए, दूसरा संकट कविता को उनकी तरफ से है, जो कविता को घटिया तरीके से कविता को पाजेब पहनाकर चौराहे पर नाचाना चाहते है, कविता की सरलता सहजता जो गाँव शहरों में बसती थी, वो फिर से जीवंत हो जरुरी है, एक कविता वो है जो किताबो में है और एक कविता वो है जो कठिन जटिल गद्य को कविता रूप में प्रसारित किया जा रहा है, कविता बोद्धिक विलास का पर्याय नहीं हाही, आज के युवाओं के लिए दो हिंदी कवियों के नाम बताना भी दुर्लभ जान पड़ता है, हमारे लोकसभा अध्यक्ष ने देश भर से ढाई सौ से अधिक बुद्धिजीवी बुलाये थे जिनमे एक भी हिंदी कवी का नाम नहीं था, इतने बुद्धिजीवियों में एक भी कवि का ना होना कवियों की कमियों की और इंगित करता है, कविता को आज जो अजीबोगरीब रूप दे दिया गया है वो सोचनीय है, कविता का आज जो बटवारा हो रहा है वो मेरी समझ से परे है, कविता में साम्प्रदायिकता नहीं होनी चाहिए, जब तक संसार में मनुष्य रहेगा तब तक कविता का वजूद बना रहेगा।

कविता मनुष्य की ताकत है इसे केवल तथाकथित विद्वानों और अभिजात्यों के दायरे से बाहर लाने की जरूरत है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि अपने देश में कविता की समृद्ध वाचिक परंपरा पूरी तरह से लुप्त हो गई है और उसके नाम पर जो कुछ बचा है उसकी सराहना नहीं की जा सकती है, क्योंकि वह पूरी तरह फूहड़ हास्य-व्यंग्य तक सीमित रह गई है। उन्होंने कहा कि पहले किताबों और पत्रिकाओं में छपने वाले महान कवि भी कवि सम्मेलनों में भाग लेते थे और आम जनता कविता से जुड़ती थी। आज किताबों में छपने वाले कवि भी आम जनता से दूर हो गए हैं और फूहड़ कवि सम्मेलनों से लोगों को कोई दिशा नहीं मिलती। हिंदी कविता समाज में अपनी पैठ बनाए आज ये प्रयास होने चाहिए ! लक्ष्मी शंकर ने अपनी कुछ कविताएं और ग़ज़ल भी सुनाई !

इसके पश्चात् गोष्ठी की अध्यक्ष कमल कुमार जी ने अपने वक्तव्य में कहा, मैं विष्णु प्रभाकर जी की स्मृति को नमन करते हुए आप सभी मित्रो का स्वागत करती हूँ, कविता नदी की तरह, धूप की तरह, हवा और नदी की तरह होती है, इन सभी का बहना अविरल और सतत है, जिन्दगी के जो अनुभव और क्षण है उनमे पिरोकर आज कविता अलग अलग ढंग से लिखी जा रही है, कविता अपने अंतस की प्रेरणा अंतस का उजास है, उसका ही प्रकाश है, कवि जब छंद में कविता बोलते है, आपके मस्तिष्क और भाव को बांधती है, छंद मुक्त कविता पहले मस्तिष्क में जा फिर भावो का आकार लेती है, उसके पश्चात् उन्होंने अपनी कुछ कविताये सुनाई !
गोष्ठी के अंत में धन्यवाद ज्ञापन नंदन शर्मा ने किया।



प्रस्तुतकर्ता : किरण आर्य
संयोजक (सन्निधि संगोष्ठी)


Saturday, 26 April 2014

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट माह : अप्रैल २०१४


सन्निधि संगोष्ठी अंक : 13
दिनाँक / माह :  26 अप्रैल 2014
विषय : एकल नाट्य प्रस्तुति एवं काव्य पाठ
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दिनांक 26 अप्रैल 2014 सायं 5 बजे से गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा के सन्निधि सभागार में काका कालेलकर और विष्णु प्रभाकर की स्मृति में अभिनेता निर्देशक रवि तनेजा जी द्वारा " प्यासा कौआ" एकल नाट्य पस्तुत किया गया, और इसके साथ ही कुछ मित्रो के द्वारा काव्य पाठ भी किया गया, एक और सफल संगोष्ठी जिसमे सम्मिलित रहे अतुल कुमार, लतांत प्रसून, अतुल जी की श्रीमती आराधना प्रभाकर, उनकी सुपुत्री और दामाद, अनीता दी, राम श्याम हसींन, भाई कौशल उप्रेती, नीरज द्विवेदी, सुमन जान्हवी, मेरी प्रिय सखी स्नेहलता मांगलिक, उसके पतिदेव भरत मांगलिक, बीना हांडा, उनके पतिदेव, उनके साथ और भी मित्र इस आयोजन का हिस्सा रहे, आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में अजय कुमार और संगम पाण्डेय जी सम्मिलित रहे !
सबसे पहले वरिष्ठ पत्रकार प्रसून जी ने अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ संगोष्ठी की शुरुवात की प्रसून लतांत ने हिंदी में नाटक लेखन के इतिहास को पेश करते हुए कहा कि तीस साल पहले तक देश के गांव-गांव में होने वाले नाटकों का चलन अब थम गया है। नाटकों का यह दौर स्थानीय युवाओं को अपनी प्रतिभा को चमकाने और उभारने का बहुत बड़ा जरिया था। उन्होंने कहा कि न केवल गांवों और कस्बों में होने वाले नाटकों का दौर खत्म हुआबल्कि हजारों सालों से चली आ रहीलोकनाट्य की परंपरा भी लुप्त होने के कगार पर है।

इसके पश्चात् प्रसून जी ने स्वागत भाषण के लिए अतुल जी को मंच पर बुलाया, अतुल जी ने स्वागत भाषण के साथ नाटक के विषय वस्तु पर प्रकाश डाला और सन्निधि संगोष्ठी को नए रचनाकारों के लिए उपयोगी मंच बताते हुए कहा कि साल भर से आयोजित की जाने वाली संगोष्ठियों में सभी विधाओं को शामिल किया गया और सौ से कहीं ज्याद नए रचनाकारों ने इसमें शिरकत की है। उन्होंने कहा कि अबकी बार नाटक को शामिल किया गया क्योंकि यह साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विधा है पर आज इसकी बहुत उपेक्षा हो रही है। इसके पश्चात उन्होंने किरण आर्य को मंच पर बुलाया !

किरण आर्य ने मंच से सभी मित्रो का अभिनन्दन करते हुए कविता पाठ के लिए उर्मिला माधव, सरिता दास, मधु लबाना और सुशील कुमार को बुलाया और उसके पश्चात् संगम पाण्डेय जी ने अपना वक्तव्य दिया !

संगम जी ने कहा नमस्कार मैं यहाँ एक ही निमित से हूँ, कि मुझे अजय कुमार और रवि तनेजा जी का परिचय कराना है, ये दोनों ही रंगमंच के जाने माने नाम है, रवि तनेजा जी का रंगमंच से गहरा नाता रहा है उनके ससुर साहब सिद्धू जी भी रंगमंच से जुड़े है, और इसके साथ उनका पूरा परिवार रंगमंच और कला को समर्पित है, ये नाटक भी उन्ही का लिखा हुआ है जिसका मंचन आज यहाँ होने जा रहा है, अजय कुमार नाट्य कला अकादमी से 2000 में स्नातक हुए उन्होंने देश विदेश की यात्रा की और नाटक किये अजय जी अभिनेता बहुत अच्छे है लेकिन इनकी निपुणता गायन में है ! उन्होंने कहा किसी कौम की सेहत के बारे में जानने का सही तरीका स्कूल और कॉलेज में मिली विद्या से होता है, सच हमेशा कड़वा कसैला होता है, और उसे पचाना मुश्किल होता है, कला के नाम पर इसे सामने आना ही चाहिए, एक लेखक अपनी ईमानदारी से इसे सामने रखता है, समाज आईना होता है, समाज के सामने विकल्प होते है, खुद को सँभालने संवारने के, नाटककार में संयम नहीं होता आलस होता है, तो वह कहानी को बांधता है कुछ पलों घंटो में ! और अंत में उन्होंने एक शेर कहा ..........काश के ख़ुदा बक्शे हमें ऐसी ताकत .........के चश्में में गैरों के हम खुद को देख सके !

इसके पश्चात् रवि तनेजा ने अपने एकल अभिनय के जरिए पेश कर यह बताया कि आज प्यास बढ़ गई है और पानी न केवल तालाबों और नदियों से गायब हो रहा है बल्कि जिंदगी का पानी भी लगातार कम हो रहा है। रवि तनेजा ने एकल अभिनय के जरिए न केवल एक गांधीवादी शिक्षक आत्माराम की विडंबनापूर्ण जिंदगी के साथ उनकी संततियों के बुरे हश्र की वजहों को उजागर किया, बल्कि चौपट हो रही दुनिया का भयावह चित्र भी प्रस्तुत किया। तनेजा गांधीवादी शिक्षक आत्माराम को स्कूल से सेवानिवृत्त होने के एक दिन पहले नौकरी से हटा देने से लेकर उनकी संतानों की बरबादी की कथा को अपने सधे अभिनय में सहज ढंग से दर्शकों में संप्रेषित करने में कामयाब रहे। गांधी और भगत सिंह के विचारों के अंतरद्वंद्व में झूलते समाज की दशा को पेश करते हुए तनेजा ने जाहिर किया कि कैसे शिक्षक आत्माराम की बेटी भाग गई। नक्सली बना बड़ा बेटा शासन की प्रताड़ना का शिकार हुआ तो छोटा बेटा नशे का शिकार हो गया। इन बरबादियों को मास्टर आत्माराम रोक नहीं सका और अपनी असमर्थता पर पछताता-टूटता आत्माराम का दर्द आज केवल उसका नहीं रह गया है बल्कि अपने देश के सच्चे मूल्यों को आधार बना कर जीने वाले हरेक आदमी का दर्द हो गया है।

और गोष्ठी के अंत में संगोष्ठी में नई शैली में नाटकों को लोक गायन से जोड़ने के लिए चर्चित निर्देशक और अभिनेता अजय कुमार ने अपनी प्रस्तुति से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।...........

किरण आर्य

Saturday, 22 March 2014

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट माह : मार्च २०१४



सन्निधि संगोष्ठी अंक : 12
दिनाँक / माह :  22 , मार्च 2014
विषय : विभिन्न विषयों पर आधारित
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नमस्कार मित्रो दिनांक 22 मार्च 2014 को सन्निधि की बारहवीं संगोष्ठी सफलता पूर्वक संपन्न हुई, संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार कथाकार अजय नावरिया जी ने की, मुख्य अतिथि के तौर पर क्षमा शर्मा जी हमारे साथ रही और इसके अतिरिक्त विशिष्ट अतिथि के तौर पर डॉ. सुरेश शर्मा, नरेंद्र भंडारी जी हमारे बीच रहे, और उनके साथ अतुल प्रभाकर जी, लतांत प्रसून जी, कुसुम शाह दी, अनुराधा प्रभाकर, अनीता प्रभाकर, अर्चना प्रभाकर जी और उनके पतिदेव, आदरणीय गंगेश गुंजन जी, नंदन शर्मा जी, राजीव तनेजा जी, उनकी धर्मपत्नी संजू तनेजा जो एक अच्छी सखी भी है और हर संगोष्ठी का हिस्सा होती है, केदार नाथ जी जो हर गोष्ठी में श्रोता तौर पर शिरकत करते आये है, प्यारी सखियाँ सुनीता शन्नो जी, अंजू शर्मा और वंदना गुप्ता, सरिता भाटिया दी, प्यारी सुमन जान्हवी, मेरे जीवन का अभिन्न अंग मेरे पतिदेव नरेन् आर्य, छोटी बहन संगीता शर्मा, बीना हांडा जी, महाखबर अखबार से सुधाकर सिंह, विवेक रॉय, गौरव गुप्ता, भाई राजेंद्र कुंवर फरियादी, सरोज जोशी, डॉ सुरेश शर्मा जी की धर्मपत्नी, सखी नेह सुनीता उनकी माँ, और अन्य कई मित्र इस आयोजन का हिस्सा रहे.......

यह सन्निधि की बारहवीं संगोष्ठी थी, इसीलिए इसमें अभी तक मंच पर आई सभी विधाओं को समाहित किया गया, जिसमे कविता, गीत, ग़ज़ल, हायकु, कहानी, लघुकथा, क्षणिका, मुक्तक, व्यंग और दोहे सभी का समावेश देखने को मिला, मंच पर आने वाले रचनाकारों में भाई सुशील जोशी (गीत), शिखा सिंह (कहानी), सीमा अग्रवाल दी, जो कोरबा से है (गीत), भाई अरुन शर्मा (ग़ज़ल), डॉ आरती स्मित (कविता), राजीव तनेजा (व्यंग), गुंजन गर्ग अग्रवाल (हायकु), भाई नीरज द्विवेदी (क्षनिकाए), पी के शर्मा (व्यंग और मुक्तक), मुन्ना भाई यानी अविनाश वाचस्पति (व्यंग), किशोर कौशल जी (दोहे) और सुमन जान्हवी (लघु कथा) लेकर मंच पर आये !!


संगोष्ठी की शुरुवात जनसता के वरिष्ट पत्रकार और सन्निधि के आधार स्तंभ लतांत प्रसून जी ने अपनी चिर परिचित उर्जावान मुस्कान के साथ की......प्रसून जी की जिन्दादिली और उर्जाशीलता हम सभी के लिए प्रेरणा स्त्रोत है, दो शब्द कहने के पश्चात् प्रसून जी ने सन्निधि संगोष्ठी की रीढ़ की हड्डी और हम सभी के मार्गदर्शक अतुल प्रभाकर जी को स्वागत भाषण के लिए आमंत्रित किया.......

अतुल जी ने अपने वक्तव्य में मंच आसीन सभी सुधिजनो और संगोष्ठी का हिस्सा बने सभी मित्रो का स्वागत करते हुए कहा कि राजधानी दिल्ली में ऐसे भी लेखक समूह हैं जो पिछले तीस सालों से लगातार मासिक संगोष्ठी करते आ रहे हैं। उनके सामने हम लोगों की उपलब्धियां बहुत कम हैं, अपार हर्ष हो रहा है, सन्निधि आज अपनी बारहवीं संगोष्ठी कर रही है ......और इसके बाद उन्होंने संगोष्ठी की शुरुवात करने हेतु किरण आर्य को मंच पर आमंत्रित किया......

संगोष्ठी की संयोजक किरण आर्य ने मंच संचालन के साथ सभी विधाओं में अपने भाव मंच से रखे और सादत हसन मंटो जी की एक लघु कथा भी उन्होंने मंच से सुनाई
और मंच पर हर विधा से रचनाकारों को अपने भाव रखने हेतु आमंत्रित किया.....

इसके पश्चात् विशिष्ट अतिथि नरेंद्र भंडारी जी ने अपने वक्तव्य में कहा मैं कोई साहित्यकार नहीं हूँ एक पत्रकार हूँ और इस आयोजन का हिस्सा बनना मेरे लिए सुखद एहसास रहा बहुत, हम पत्रकार हमेशा कटघरे में खड़े नज़र आते है, लेकिन फिर भी चरवेती सिद्धांत पर अमल करते हुए करते है अपने कर्तव्य का निर्वाह सतत उसी प्रकार आप सभी के ये प्रयास सफल रहे और रंग लाये !
डॉ सुरेश शर्मा जी ने अपने वक्तव्य में कहा आज की गोष्ठी में कुछ भाव और व्यंग बहुत बढ़िया थे, सन्निधि की इस उपलब्धि पर मैं अतुल जी और सन्निधि के सभी सदस्यों को बधाई देता हूँ, उसके पश्चात् उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल और दो कविताएं सुनाई, जिनमे उनकी कविता दुमकटी ने दिल पर एक अलग छाप छोड़ी !

इसके पश्चात् संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत करने वाली क्षमा शर्मा जी जो नंदन की पूर्व अध्यक्ष रह चुकी है, और अभी भी बहुत सी सामाजिक संस्थाओ के साथ जुडी है, ने अपना वक्तव्य दिया, क्षमा जी ने अपने वक्तव्य में कहा, सभागार में उपस्थित इतने सारे रचनाकारों को एक साथ देखकर मैं स्तब्ध हूँ, मैं साधुवाद देती हूँ किरण आर्य को उन्होंने सभी विधाओं में हाथ आजमाया है, उन्होंने कहा सुशील जोशी ने राधा के गाल से गुलाल लेने की बात कही, तो भाई साहब गोरा करने की क्रीम बनाने वालो ने सुन लिया तो पीछे पढ़ जायेंगे, शिखा सिंह की कहानी स्त्रियों की उस मानसिकता को दर्शाती है, जो सुविधाओं का गलत उपयोग करने की भावना को बखूबी दर्शाती है, स्त्री के व्यक्तित्व में जो नकारत्मक है आज स्त्री उसे लिख रही है, वो सराहनीय है, मैं बधाई देती हूँ आप सभी को आपके प्रयासों और सृजनशीलता के लिए ! उन्होंने कहा मुख्य अतिथि की भूमिका बेटी को विदा करने वाले जैसी होती है, किसी की अधिक तारीफ कर दी तो दुसरो को लगता है हमारी तो बखिया उधेड़ दी और इस पर इतनी मेहरबानी क्यों, तो मैं सभी रचनाकारों को स्नेह आशीष देती हूँ !


उनके वक्तव्य के पश्चात् प्रसून जी अध्यक्ष महोदय को बुलाते हुए कहा आज की गोष्ठी में वट वृक्ष वल्लभ डोभाल जी अगर हमारे बीच नहीं आ पाए तो, तुलसी पौधे के रूप में अजय नावरिया जी का हमारे बीच होना भी एक सुखद एहसास है !

अजय नावरिया जी जो दलित लेखक संघ के अध्यक्ष है, उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा, मैं आप सभी को बधाई देता हूँ एक सफल संगोष्ठी की, फेसबुक ने इतना सरल कर दिया है, हम सभी आज चेहरे से एक दुसरे को पहचानते है, आज यहाँ एक तरफ नए रचनाकार है तो दूसरी तरफ पी के शर्मा जी और अविनाश वाचस्पति जी जैसे मंजे रचनाकार भी है, जो नए है वो नएपन को ओढे है और जो पुराने है वो अनुभव के पिटारे के साथ, अविनाश जी को सामने देखकर एक विचार आया हमें अपनी विधा को पहचानना होगा, और अगर हम देर करते है तो बहुत कुछ पीछे छूट जाता है, पहले मैं कविताएं लिखता था, आज जब उन कविताओं को देखता हूँ तो लगता है कितना बचकाना है वो सब, फिर कहानियां लिखना शुरू किया तो लगा हाँ यहीं है मेरी विधा, हम लिखते है, तो केवल लिखने भर के लिए नहीं उसके साथ समकालीनों को पढना भी आवश्यक है, जरुरी है हम परम्परा और समकालीनों को पढ़े, आपको प्रशिक्षण की जरूरत है समय को बदलना है तो खुद को पहचानना होगा, आप सभी ने कुछ हद तक तो मुझे अभिभूत किया ही, बाकी सतत प्रयास ही आगे बढ़ने की कुंजी है !

 प्रसून जी ने कहा की नावरिया जी का कुछ हद तक अभिभूत होना संगोष्ठी की सफलता का घोतक है, बढ़ते हुए पौधों को काटा नहीं जाता है, हम लकड़हाडे नहीं माली है, वरिष्ठ साहित्यकारों को हमारे बीच बुलाने का ध्येय ही ये है की उनके अनुभवों से नए रचनाकार कुछ सीख पाए !
अंत में नंदन शर्मा जी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया और साथ ही ये भी कहा हर समय ये होता आया है जो नए रचनाकार आते है अगर उन्हें बहुत अधिक क्रिटिसाइज कर दिया जाए तो वो भाग जाते है, निराश हो जाते है, तो हमें उन्हें भगाना नहीं उनकी हौसला अफ़जाई करना है !..............


प्रस्तुतकर्ता : किरण आर्य

Friday, 7 March 2014

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट माह : फरवरी २०१४

सन्निधि संगोष्ठी अंक : 11
दिनाँक / माह : 15 फरवरी, 2014
विषय : हायकु / साहित्यिक पत्रकारिता


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नमस्कार मित्रो 15 फ़रवरी को सन्निधि की ग्यारवीं संगोष्ठी जो साहित्यिक पत्रकारिता पर आधारित रही, इस संगोष्ठी की अध्यक्षता जाने माने साहित्यकार सीतेश आलोक जी ने की, मुख्य अतिथि के तौर पर राहुल देव जी हमारे बीच रहे, जो जनसता और आज तक से संपादक के तौर पर जुड़े रहे है .....उनके अतिरिक्त वक्ता के तौर पर विवेक मिश्रा, स्नेहा ठाकुर, विपिन चौधरी, शिवानंद सहर द्विवेदी, और आशीष कांध्वे जी संगोष्ठी का हिस्सा रहे, इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से मित्र जिनमे केदार नाथ जी, मिथिलेश श्रीवास्तव जी उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अनीता श्रीवास्तव जी, संगीता शर्मा, सुशिल जोशी, कामदेव शर्मा, भाई अविनाश वाचस्पति जी उनके मित्र डॉ सुरेश चन्द्र जी उनकी धर्म पत्नी, श्री गंगेश गुंजन जी सहित बहुत से मित्र गण हमारे साथ शामिल रहे.....
संगोष्ठी की शुरुवात लतांत प्रसून जी ने की, और स्वागत भाषण के लिए अतुल जी को आमंत्रित किया, अतुल जी ने स्वागत भाषण के साथ ही संचालन की बागडोर प्रसून जी को सौप दी, प्रसून जी ने साहित्यिक पत्रकारिता की बात करते हुए सबसे पहले विवेक मिश्रा जी को बुलाया.

विवेक मिश्रा जी ने कहा साहित्यिक पत्रकारिता के विषय में बात करते हुए ये जानना आवश्यक है कि साहित्यिक पत्रकारिता क्या है? साहित्यिक पत्रकारिता की बात करते हुए किताबों की बिक्री या अन्य विषयों पर बात भटक जाती है ! जब हम साहित्य की बात करते है तो हम एक भाषा एक विषय की बात नहीं करते है, एक संस्कृति एक समाज के दायरे में साहित्य को नहीं बांधा जा सकता है, जब हम पत्रकारिता की बात करते है तो चीज़े बड़े और व्यापक स्तर पर लेते है, एक चींटी आकाश को मोडती है और आकाश को लील लेती है, साहित्यिक पत्रकारिता केवल सूचना का सन्दर्भ नहीं है, सवालों विचारों तक ले जाने वाली दुनिया है, समाज की परत दर परत खोलने का काम साहित्य के माध्यम से किया जा सकता है, यह व्यवस्था के विरोध की दुनिया है, जीवन में महिमामंडन की दुनिया है, उपदेश्य है जीवन की उदारता, साहित्य के बिना दुनिया चल तो सकती है, लेकिन कहीं पहुच नहीं सकती है, हिंदी में पत्रकारिता 19०० में सरस्वती संपादन में हमारे सामने आई व्यापक रूप में, और जब उसमे वृन्दालाल जी प्रेमचंद जी का उद्भव हुआ तब साहित्यिक पत्रकारिता मुखरित हुई, और रचनाये अधिक मारक सिद्ध होने लगी, १९४७ आजादी के मोहभंग का समय रहा, और सोच जाति धर्म को छोड़ वामपंथ का आलिंगन करने लगी ! बाज़ार आगमन के समय हंस जैसी पत्रिका का उदभव हुआ जो आज तक स्थाई है, हंस के साल बीत जाने के बाद साहित्यिक पत्रकारिता जो हाशिये पर खड़ी थी वर्गीकरण मांगने लगी आज जरूरत है साहित्यिक पत्रकारिता को परिभाषित करने की उसका वर्गीकरण करने की !
इसके पश्चात् किरण आर्य ने साहित्यिक पत्रकारिता पर अपने अल्प ज्ञान के साथ कुछ बातें कहते हुए स्नेह ठाकुर जी को मंच पर आमंत्रित किया !

स्नेह ठाकुर जी ने अपने वक्तव्य में कहा मैं श्रदेय काका साहब जी को नमन करते हुए सयोजकों को धन्यवाद देना चाहती हूँ, काका साहेब स्मरणीय है काश मुझे उनके सानिध्य के कुछ पल प्राप्त हो पाते, बड़े बड़े विद्वान् मंचासीन है किरण जी से मेरा ज्ञान अल्प से भी अल्पतर है, विवेक जी ने काफी अच्छी व्याख्या की, और हमारे ज्ञान को बढाया, मैं ४५ साल से कनाडा में हूँ, मैं भाषा ज्ञान को समझती हूँ मेरा बेटा नही समझ पायेगा द्विवेदी जी ने जो निर्भीकता दिखाई मैं उसे ही पकड़कर निर्भीकता से बात कर रही हूँ, मेरे लिए गर्व का विषय है, स्नेह ठाकुर ने कोयले में से हीरा निकाला, समस्या मेरे सामने साहित्यिक पत्रिका निकालने की है विदेशों में अपनी भाषा को लेकर अधिक कुछ निकाल सकते है, हम विदेशों में केवल कहने भर को भारतीय है, उससे पहले बंगाली बिहारी या उतराखंडी है, यानी क्षेत्रवाद हावी है, कुछ कहते है, गाढ़ी हिंदी मत लिखिए कुछ कहते है कुछ तो साहित्यिक कीजिये तो समस्याएँ आती है बहुत सी आती है, लेकिन प्रयास रहता है की भारतीय संस्कृति को निखार सकूँ और रूप देती रहूँ !

उसके पश्चात् आशीष कंधवे जी ने अपना वक्तव्य दिया, उन्होंने कहा मैं नमन करता हूँ प्रसून जी अतुल जी और उनके साथ जुड़े सभी सदस्यों को जो हांक रहे है उस रथ को,जो साहित्य को दिशा दे रहा है नई, आज के सन्दर्भ में कहूँ तो खबरों को सनसनीखेज बनाना और टी आर पी के अनुसार परोसना आज पत्रकारिता है, पहले पत्रकारिता की मूल भावना जन चेतना थी जो आज शून्य हो गई है, जो प्रेरित है बाजारवाद और बहुत सी बहती हवाओं से, साहित्य का संस्कार खत्म हो गया है, उस पीढ़ी को मत रोइए जो बीत गई आज को सोचिये सुधारिए मन आज की सोचता हूँ उसे बुनता गुनता हूँ, साहित्य साहित्यिक उत्थान का परिचायक है, उसे हलके में नहीं लिया जा सकता है, निज भाषा को शुभाकांक्षी होना चाहिए, उसे एक खूटे से बंधकर नहीं रहना चाहिए, जब हम खूटे से बंध जाते है तो गुलाम हो जाते है, और जो गुलाम वो निष्पक्ष नहीं हो सकता है, विमर्शपूर्ण हो पत्रकारिता लेकिन ग्रस्त नहीं होनी चाहिए, समाज को उसके शिवत्व को प्राप्त करने के लिए पत्रकारिता माध्यम होनी चाहिए ! पत्रकार मतलब खालसा यानी सच्चा जो खालसा नहीं हो सकता वो पत्रकार नहीं है, पतन की कोई सीमा नहीं है, लेकिन अधोगामी प्रवृतियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देना ही पत्रकारिता है !
विपिन चौधरी ने अपने वक्तव्य में आकड़ो पर प्रकाश डाला कि आज नामचीन अखबारों को पढने वालो की संख्या में जो अधोगति आई है, उन्होंने कहा हिंदी युग्म वाले हम सभी किसी भी विषय को सकारात्मक तौर पर नहीं देख पाते है और साहित्य के हासिए पर होने की ये एक प्रबल वजह है, और इसके साथ ही विपिन ने अपने वक्तव्य में साहित्यिक पत्रकारिता में एक नए आयाम को जोड़ा !
शिवानंद सहर ने अपने वक्तव्य में कहा बोलने के लिए बहुत कुछ नहीं मेरे पास केवल कुछ बुनियादी ठोस बातें कहूँगा, पत्रकारिता पहले पत्रकारिता है, पत्रकारिता के कई पक्ष होते है, जैसे सुचना का संप्रेक्षण, विचारो का संप्रेक्षण, संवादों का संप्रेक्षण इत्यादि जब साहित्यिक पत्रकारिता की बात आती है, तो रिपोर्टिंग एक मात्र ऐसी विधा है, जहाँ आपसे निष्पक्षता की उम्मीद ज्यादा से ज्यादा की जाती है, सूचनाये आती है उन्ही के आधार पर खबरे बनती है, खबर वहीँ होती है जिसे दबाने की मंशा हो, उसके अतिरिक्त बाकी सब केवल विशुद्ध विज्ञापन है, साहित्य में क्या छिपाने की चाह है? साहित्य को इंसान से बड़ा नहीं मानता हूँ, हिंदी लोकभाषाओ का जोड़ तोड़ कही जा सकती है, हमने तमाम भाषाओ से शब्द लिए विधाएं नहीं ली, कोई भी साहित्य मनुष्य और मानवता से बड़ा नहीं हो सकता है !

राहुल देव जी ने अपने वक्तव्य में कहा हिंदी में औपचारिकता वैसे भी बहुत ज्यादा है, मैं पत्रकारिता में रहा हूँ, तो साहित्यिक पत्रकारिता से सरोकार पड़ता रहा है मेरा, और आज भी है, मैं हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के विषय में नहीं बोल सकता हूँ, हिंदी अखबारों में साहित्य के विषय में क्या छपता है, थोड़ी बहुत आलोचना पढता रहता हूँ, साहित्यिक पत्रकारिता के प्रभाव से हम बच नहीं सकते है, बहुत उर्जवाद है, हिंदी की रचनाशीलता साहित्य अनुराग बना हुआ है, आज हिंदी की व्यापकता में एक सिकुडन आती दिखती है, समाज में साहित्यकार की जगह भी सिकुड़ी है, हमारे पिता जो थे वो सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं थे, लेकिन वो थे तो हम है, उनके योगदान को हम अनदेखा नहीं कर सकते है, या ये नहीं कह सकते उन्होंने ये नहीं किया, उन्होंने अपने संसाधनों के साथ जो दिया वो महत्वपूर्ण है, उसी प्रकार महावीर जी नहीं होते तो हिंदी का स्तर क्या होता? साहित्य में भी क्षेत्रवाद हावी होता गर महावीर जी नहीं होते, हिंदी पर विदेशी साहित्य प्रवृति का बड़ा प्रभाव रहा है, हमने स्वयं को बाहरी दृष्टिकोण से अधिक मापा समझा है, जो भी मित्र अपने प्रयासों से साहित्यिक पत्रिका निकाल रहे है वो सराहनीय है, रिपोर्टिंग में संवादहीनता जो आ रही है चिंताजनक है, साहित्य के क्षेत्र में बड़े अखबारों में साहित्य का स्तर गिरा है, हिंदी की सरकती जमीन को रोकने का प्रयास नहीं दिख रहा है, जो आज स्थिति है वो हिंदी की हत्या या बलात्कार से विलग नहीं है, बड़े अखबारों में ये लगातार दृष्टिगोचर हो रहा है, ये प्रश्न पूछा जाए मठाधीशों से आपके समय में बड़े अखबारों में हिंदी अखबारों में जो छपता रहा उसका क्या स्तर है? और उसके प्रति आपकी जवाबदेही क्या है? गुटबाजी सब जगह होती है, लेकिन हिंदी साहित्य में जितनी खेमेबाजी दिखती है जितनी टांग खिचाई दिखती है, वो आश्चर्यजनक है, जबकि उसके पास वो जमीन वो खाद है, जिसके माध्यम से हिंदी विश्व स्तरीय बन सकती है, साहित्य में गाली गलौज देखने सुनने को मिलती है, भंगिमाओ में, भयानक रोग है छपास रोग, फूल मालाओं लफ्ज़बाजी के बगैर काम नहीं चलता, एक दुसरे की प्रशसा एक जैसे चेहरे गुटों के बीच तुम भी खुश मैं भी खुश जैसा दर्शन चलता रहता है, हिंदी ने अपना अभिजन नहीं पैदा किया है, आज देश में नायक की जरूरत है, हिंदी में नायकत्व नहीं दीखता है, जो नहीं रहे उन्हें महान नहीं बनाना है, जो जीवित है उनमे से नायक को ढूंढना है !

डॉ सीतेश आलोक जी ने अपने वक्तव्य में कहा साहित्य सामाजिक सरंचना को भी नहीं देख पा रहा है, उन्होंने हिंदी विशुद्ध हिंदी के प्रयोग प्रचार प्रसार पर जोर दिया उन्होंने कहा हिंदी के उत्थान के साथ ही साहित्यिक पत्रकारिता और समाज का उत्थान जुदा हुआ है !

और सबसे अंत में कामदेव शर्मा जी ने शानदार ढंग से धन्यवाद ज्ञापन करते हुए संगोष्ठी के समापन की घोषणा की .


प्रस्तुतकर्ता : किरण आर्या

Wednesday, 22 January 2014

सन्निधि संगोष्ठी विस्तृत रिपोर्ट अंक 10 (18- जनवरी- 2014 )

सन्निधि संगोष्ठी अंक : 10
दिनाँक / माह : 18 जनवरी, 2014
विषय : हायकु / क्षणिका 


नमस्कार मित्रो 18 जनवरी को सन्निधि की दसवीं गोष्ठी जो "हायकु और क्षणिकाओं" पर आधारित रही सफलता पूर्वक संपन्न हुई गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ गज़लकार हायकुकार साहित्यकार श्री कमलेश भट्ट कमल जी ने की,मुख्य अतिथि के रूप में हायकुकार और नवगीतकार श्री जगदीश व्योम जी हमारे बीच में रहे, साथ में अतिथि कवयित्री के तौर पर डॉ वंदना ग्रोवर दी और अतिथि कवि के तौर पर श्री सीमान्त सोहल जी हमारे बीच रहे ! उनके अलावा अतुल प्रभाकर जी उनकी धर्म पत्नी आराधना जी, उनकी सुपुत्री और दामाद जी के साथ प्यारी सी स्वस्ति, लतांत प्रसून जी, कुसुम शाह दी, नंदन शर्मा जी, पुष्पा जोशी, नेहा नाहता, अर्चना प्रभाकर जी उनके पतिदेव, सुबोध कुमार, बीना हांडा जी, राजीव तनेजा, बलजीत कुमार, कामदेव शर्मा, निरुपमा सिंह, रश्मि नाम्बियार, मृदुला शुक्ला, शोभा मिश्रा, देवेश त्रिपाठी, बबली वशिष्ठ, नीरज द्विवेदी, निवेदिता मिश्रा झा, संजय सिंह, आरती शर्मा, राजेंद्र कुंवर फरियादी, संजय कुमार गिरी, प्रियंवदा सिंह, महाखबर अखबार के संपादक सुधाकर सिंह और रांची से व्यंग लेखक पंकज यादव जी पधारे ! 

आयोजन की शुरुवात लतांत प्रसून जी ने अपनी चिरपरिचत मुस्कान के साथ अतिथियों के लिए दो शब्द कहकर की, प्रसून लतांत ने हाइकू और क्षणिकाओं के उद्भव और उसके विकास की चर्चा करते हुए कहा कि विधाएं अलग-अलग भले हों लेकिन वे महत्त्वपूर्ण इसलिए होती हैं कि उसमें किस हद तक सच्चाइयां पिरोई होती हैं। उन्होंने कहा कि 19वीं सदी में जापान में शुरू हुए हाइकू का भंडार काफी समृद्ध है। अब यह हिंदी में भी उपलब्ध है। हिंदी के वरिष्ठ आलोचक क्षणिका जैसी विधा पर तवज्जो नहीं देते पर इसकी रचना भी खूब हो रही है और विभिन्न लघु पत्रिकाओं ने विशेषांक निकाल कर इस विधा के रचनाकारों को प्रोत्साहित भी किया है।
अतुल कुमार जी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए नए रचनाकारों से अपने वरिष्ठ लेखकों की रचनाओं का पाठ करने की जरूरत पर जोर दिया और सन्निधि संगोष्ठी के मकसद को उजागर करते हुए नए रचनाकारों की भूमिका का उल्लेख किया। 

रचनाकरों की ओर से संगोष्ठी के संचालन में अथाह योगदान के लिए विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के सचिव अतुल कुमार जी और उनकी धर्मपत्नी अनुराधा जी का सम्मान भी किया गया।
उसके पश्चात् अतुल जी ने किरण आर्य को सञ्चालन के लिए निमंत्रित किया ! किरण आर्य ने अपनी मुस्कान के साथ जो उनकी पहचान भी है, गोष्ठी की शुरुवात अपने हायकु गुरु पवन कुमार जैन जी के कुछ हायकु पढ़कर की, और हायकु के प्रचार प्रसार में पवन जी के योगदान को भी इंगित किया, मंच पर कुल 8 रचनाकारों ने अपने हायकु और क्षनिकाएं रखी, जिनके नाम है .....अरुन सिंह रूहेला, सुनीता अग्रवाल, सुशीला शिरोयन जी, संगीता शर्मा, राजीव गोयल, किरण आर्य, अभिषेक कुमार अभी, और शोभा रस्तोगी के अलावा हमारी अतिथि कवयित्री डॉ वंदना ग्रोवर दी ने अपनी कुछ क्षनिकाएं और कविताये सुनाई, जो दिल को छू लेने वाली रही, उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा की मैं सिर्फ मैं हूँ ..हमारे दूसरे अतिथि कवि सीमान्त सोहल जी ने भी अपनी कुछ कविताएं सुनाई, और सभी का मन मोह लिया ! 

उसके पश्चात हमारे मुख्य अतिथि श्री जगदीश व्योम जी ने काका कालेलकर जी को प्रणाम के साथ अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया, उन्होंने कहा आज फेसबुक ऐसा माध्यम है जहाँ सभी एक दुसरे से मुखातिब होते रहते है, और वहां दिखने वाले चेहरों को आपने यहाँ एकत्रित किया ये एक बहुत अच्छा आयोजन रहा, जैसे हायकु एक बंधी हुई विधा है, वैसे ही किरण आर्य ने हायकु जैसे ही समय को भी बाँध दिया, सहित्य में जितनी छोटी विधा होती है वह उतनी ही कठिन होती है, किसी बात को कम शब्दों में कहना कठिन होता है बहुत, जो लोग ये सोचकर लिखते है की छोटी विधा है तो आसान होगी वो लोग गलती करते है, कई बार ये बात उठती है की भारत मे इतने प्रकार के छंद है तो फिर हायकु ही क्यों? आप हर कथ्य को कहे कि दोहे में ही कहा जाए तो ये संभव नहीं है, अगर ये संभव होता तो तुलसीदास जी दोहे और चौपाई को छोड़कर बरवे रामायण नहीं लिखते, सभी विधायें एक दुसरे की पूरक है, जिस विधा में हम अपनी बात सहजता से कह सके वो विधा अच्छी है, इसके पश्चात उन्होंने अपने कुछ हायकु पढ़े जो समसामयिक और प्रेरक रहे ! 

इसके पश्चात् संगोष्ठी के अध्यक्ष श्री कमलेश भट्ट कमल जी ने अपने वक्तव्य में कहा, गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के तत्वाधान से होने वाली इस गोष्ठी में शामिल होने का अवसर देने हेतु मैं किरण आर्य और अतुल प्रभाकर जी का आभारी हूँ क्युकि हम रहते तो गाजिअबाद में है लेकिन दिल्ली हमारे लिए दूर बनी रहती है, और दिल्ली को इन्होने हमारे करीब किया, और ये करीबी जिस विधा की वजह से बढ़ी वो कलेवर में छोटी होने के वाबजूद हायकु बड़ी विधा है, जिस तरह दिल्ली में रहते हुए हम आम आदमी की ताक़त समझ सकते है, वैसे ही हायकु एक बहुत ही महत्वपूर्ण विधा है, क्षणिका का जन्म कहाँ से हुआ इसके विषय में ठीक ठीक कुछ कह पाना संभव नहीं है, यह हमारी प्रयोगवादी नई कविता का ही एक हिस्सा है, जिसमे हम संक्षेप में अपनी बात को कुछ शब्दों में सीमित कर देते है, हायकु मुक्तक कविता की जापानी शैली है, जापान में ये सबसे लोकप्रिय शैली है कविता की, बाशो ने १७ वीं शताब्दी में हायकु को एक पहचान दिलाई, आज दुनिया भर में हायकु लिखे जा रहे है अगर आप हिंदी की ही बात करे तो हिंदी की सभी भाषाओं में आज हायकु लिखे जा रहे है, भारत में पहली बार हायकु की चर्चा रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने की १९१६ में, उन्होंने कहा हायकु दुनिया की सबसे छोटी विधा है, हमने हायकु को छंद के रूप में प्रयोग करना शुरू कर दिया, उसके पश्चात १९५९ में अज्ञेय जी ने अपनी पुस्तक में हायकु की पहली चर्चा की, उसके बाद भी हायकु बहुत लस्तम पस्तम चलता रहा !

जेनयु के प्रो. सत्यभूषण शर्मा जी जो पहले जापानी प्रोफ़ेसर थे, उन्होंने हायकु के विषय में विस्तार से बताया, हायकु का ५-७-५ का शिल्प क्या होता है, तो हायकु के प्रचार प्रसार का सारा श्रेय जेनयु को ही जाता है, किरण आर्य भी जेनयु से जुडी है, तो एक बार फिर हायकु जेनयु में लौट रहा है, १९७० के आसपास उन्होंने एक हायकु क्लब की स्थापना भी की, और एक हायकु पत्रिका की शुरुवात भी की, इस हायकु पत्रिका ने विश्व भर में हायकु को एक पहचान दिलाई, प्रो. सत्यभूषण जी कहते थे हायकु सत्य की साधना है, यहाँ शब्दों का बहुत अपव्यय है अज्ञेय जी कहते थे शब्द उर्जा है, और उसका सार्थक प्रयोग होना चाहिए, गाली में भी शब्द होता है, और कविता में भी, साहित्य के माध्यम से हायकु में हम सबसे सटीक ढंग से घनात्मक उर्जा का प्रयोग कर पाते है, हायकु को हम जब जानना शुरू करते है तो उलझन होती है और समझ लीजिये यहीं से हायकु आपको पकड़ रहा है, व्योम जी हमारे बीच है आज हायकु के क्षेत्र में उनका नाम बहुत प्रचलित नामो में से है शुरू में वो कहा करते थे अरे ये भी कोई विधा है, हायकु में बहुत अधिक व्याख्या नहीं होनी चाहिए हायकु स्वयं अपनी बात कहे, वो स्वत बोलता है, हायकु का एक कविता हो जाना उसे सार्थकता प्रदान करता है, अपने कुछ हायकु सुनाने से पहले उन्होंने कहा की अंत में मैं एक बात कहना चाहूँगा इस गोष्ठी में अधिकतर चेहरों को हमने मुस्कुराते हुए देखा, मित्रो हम देखते है साहित्य की गोष्ठियों में अधिकतर चेहरे उदास लटके हुए होते है, अगर साहित्य हमें थोड़ी देर के लिए जीवंत भी ना कर सके तो उसकी सार्थकता कैसी? मंच पर जितने प्रतिभागी आये उनमे बहुत संभावनाए और आत्मविश्वास दिखा, और इसके पश्चात् उन्होंने अपने कुछ हायकु पढ़कर सुनाये ! 

इसके पश्चात् विजयदान देथा की कहानियों पर आधारित एक नाटक का सुमन कुमार के निर्देशन में मंचन किया गया। सांप की व्यथा कथाओं पर केंद्रित इस नाटक को दर्शकों ने खूब सराहा.

प्रस्तुतकर्ता : किरण आर्या